नीमच। मां शक्ति की आराधना का पर्व नवरात्रि चल रहे हैं । मालवा की वैष्णो देवी के नाम से विख्यात महामाया भादवा माता आरोग्य की देवी हैं.जो भी माता के दरबार में आता है अपने कष्टों से मुक्ति पाता है. माता सब की मुरादें पूरी करती हैं, सूनी गोद भरती हैं. यहां लकवा रोग से ग्रसित सबसे अधिक मरीज आते हैं. इन दिनों माता के दरबार में भक्तों का आना जाना बढ़ जाता हैं,प्रतिदिन भक्तों की भीड़ बढ़ रही हैं,,जैसे जैसे  नवरात्रि की अष्टमी नजदीक आएगी वैसे वैसे भक्तों की भीड़ बढ़ती जायेगी,,अष्टमी के दिन  एक लाख से अधिक भक्त माता के दर्शन करेंगे,,भादवा गांव में देवी होने से माता का नाम इस गांव के नाम से भादवा माता पड़ा। माना जाता है कि भादवा माता देश का एक मात्र सबसे बड़ा आरोग्य तीर्थ है.जहां बड़ी संख्या में लकवा,चर्मरोग सहित अनेक असाध्य रोगों से ग्रसित लोग आते हैं.महामाया भादवा माता अपने भक्तों की पीड़ा को दूर करने के साथ उनकी मुरादें भी पूरी करती हैं. सैकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर के प्राकटय को लेकर अलग अलग मान्याताएं प्रचलित हैं.नीमच जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर इस मंदिर को आरोग्य तीर्थ भी कहते हैं। मान्यता है- यहां मौजूद प्राचीन बावड़ी के जल से लकवा, मिर्गी जैसे असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। भादवा गांव में मंदिर स्थित होने के कारण इनका नाम भादवा माता पड़ा। यहां शुरुआत से मुख्य पुजारी भील समुदाय का ही रहा है। हालांकि,गांव में ब्राह्मण और भील दोनों समुदाय के लोग रहते हैं। मालवा की वैष्णो देवी के नाम से प्रसिद्ध है। सोमवार सुबह 10:30 बजे शुभ मुहूर्त में घट स्थापना की गई। मंदिर के पुजारियों ने परंपरागत रूप से ज्वारे बोए। इसके साथ ही ज्योत प्रज्ज्वलित कर आरती की गई। कार्यक्रम में विधायक दिलीपसिंह परिहार,कलेक्टर हिमांशु चंद्रा और एसपी अंकित जायसवाल ने अन्य जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के साथ मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजा चढ़ाई। स्वपन में आईं माता भावदा,मंदिर के पुजारी बताते हैं कि 'वर्तमान में भील समाज के लोग सैकड़ों वर्षों से माता की सेवा करते आ रहे हैं. इनके पूर्वज राजस्थान के बेगु से आकर पहले जिले के महेंन्द्री गाँव में बसे.यहा से दो भाई धन्नाजी और रूपाजी भादवा आये.रूपाजी पास के गांव सावन में चले गये.वहीं,धन्नाजी यही भादवा में बस गये.एक दिन किसी बात से नाराज होकर रूपाजी रूठकर अरणी के पेड़ के नीचे बैठ गये.उसी रात रूपाजी को स्वपन में आकर माता ने कहा की ''मेरी प्रतिमा अरणी पेड़ के नीचे दबी है,उसे निकाल कर स्थापित करो पूजा करो.''चांदी के सिंहासन पर विराजित माता,कहते हैं जब मेवाड़ के महाराणा मोकल को माता के चमत्कार के बारे पता चला तो वे भादवा आये. उन्होंने संवत् 1482 में भीलों को पूजा का अधिकार दिया था. आज भी मंदिर के पुजारी उसी भील परिवार के हैं. माता की प्रतिमा बड़ी ही मनोहारी है. माता चांदी के सिंहासन पर विराजित हैं. प्रतिमा के पास नीचे की ओर नवदुर्गा के नौ रूप ब्राम्हाणी, माहेष्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंह, ऐन्द्री, ष्विदती, चामुण्डा विराजमान हैं. नौ देवियों के समक्ष अखण्ड ज्योति वर्षों से जल रही है. मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा है. जिसमें भगवान शेषषैया पर विराजे हैं. इसी तरह माता पार्वती और भगवान शंकर की आलिंगनबध प्रतिमा है. रोज रात्रि मंदिर में आती हैं माता,वहीं पुजारी अर्जुन भील बताते हैं कि, ''मंदिर के गर्भ गृह के बाहर मुख्य द्वार के पूर्व भगवान गणेश और हनुमानजी विराजे हैं. वहीं पश्चिम में भैराव व गोराजी की प्रतिमा विराजित है. मान्यता है माता के धूनि में से निकलने वाले धागा या कलावा को रोगी या रोगग्रस्त अंग पर बांधने से जल्द ही रोग से मुक्ति मिलती है.'' मान्यता है कि माता हर रोज रात्रि में मंदिर परिसर में आती हैं और रोग ग्रस्त लोगों देख कर उनके रोग दूर करती हैं. इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग 12 महीने 24 घंटे मंदिर मे ही निरोगी होने तक डटे रहते हैं.

जिंदा मुर्गा, बकरा तक चढ़ाते हैं श्रद्धालु,
मन्नत पूरी होने पर भक्त माता को सोने-चांदी के छत्र,
श्रृंगार और बीमार रोग ग्रस्त अंग के ठीक होने पर चांदी की प्रतिकृति बनाकर चढ़ाते हैं। मंदिर में बलि का रिवाज नहीं है। कुछ लोग जिंदा मुर्गा,बकरा भी यहां चढ़ाते हैं। इसके बाद ये प्राणी मंदिर परिसर में ही घूमते रहते हैं। हालांकि प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी है। अब मंदिर में चांदी के बकरे और मुर्गे अर्पित किए जाते हैं।
नवरात्रि में 30 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात
नीमच के एएसपी नवल सिंह सिसोदिया ने बताया कि सुरक्षा के लिहाज से मंदिर में कई जगह सीसीटीवी लगाए गए हैं। 30 पुलिस,10 चौकीदार और 10 प्राइवेट एजेंसी सहित करीब 50 लोग मेले की सुरक्षा में हैं। अष्टमी के दिन जिले के कई थाना प्रभारी सहित वरिष्ठ अधिकारी और 300 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। विशेष चिकित्सा केंद्र और स्थायी पुलिस चौकी बनाई गई है।
अष्टमी के दिन जिले में रहता है छुट्टी
मंदिर में आमतौर पर रोजाना करीब 1500 से दो हजार श्रद्धालु आते हैं। वहीं, नवरात्रि में 10 से 15 हजार रोजाना श्रद्धालु आते हैं। अष्टमी के दिन एक लाख तक श्रद्धालु यहां आते हैं। हर साल चैत्र और अश्विन महीने की नवरात्रि में यहां मेला भी लगता है। माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है।
ऑनलाइन दर्शन की भी व्यवस्था
भादवा माता ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष कलेक्टर और सचिव एसडीएम हैं। मंदिर समिति के सदस्य अलग-अलग क्षेत्र के वरिष्ठ व्यक्ति और जनप्रतिनिधि हैं। साल 1935 से ट्रस्ट का संचालन शासन के अधीन है। ट्रस्ट के जरिए साफ-सफाई, यात्रियों के रहने के लिए धर्मशाला, स्नान-ध्यान के लिए सुलभ कॉम्प्लेक्स,अन्न क्षेत्र के माध्यम से रियायती भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। भक्तों को घर बैठे ऑनलाइन दर्शन की सुविधा भी है। इस वर्ष 9 की बजाय दो तीज होने के चलते 10 दिन तक मेला चलेगा।
  मंदिर में नहीं चढ़ाई जाती जीव की बली,मान्यता है कि बावड़ी के जल से स्नान करने, रोग ग्रस्त अंग पर भस्म लेपन करने, कलावा बांधने और मंदिर की परिक्रमा करने से व्यक्ति जल्दी ठीक होता है.भादवा माता में किसी भी जीव की बली नहीं चढाई जाती है. माता हार, फूल, नारियाल चिरोंजी दाना चढ़ाने से अति प्रसन्न होती है. मंदिर से लगी एक अति प्राचीन बावडी है. कहा जाता है कि इस बावडी के जल में स्नान व आचमन करने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है. जो लोग यहां आने में असमर्थ होते हैं या किसी कारण से नहीं आ पाये, उनके लिए परिजन जल भरकर ले जाते हैं.