धानुका एथेनॉल प्लांट से बढ़ता प्रदूषण — नीमच की हवा में घुलता जहर, स्वास्थ्य पर गंभीर असर
13 Nov 2025
Local News
नीमच। विगत एक माह से निरंतर मोरवन क्षेत्र में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा जहां डेम के पास लगने वाले कपड़ा फैक्ट्री का पर्यावरण व प्रदूषण को लेकर विरोध कर रहे है, उसके जवाब में MPIDC व फैक्ट्री मालिक द्वारा पूरे नियमों के पालन की बात कर रहे है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे ही वादे और नियमों में नीमच क्षेत्र में धानुका प्लांट वालों के भी कागजों में अपने दावे रहे थे, लेकिन सारे दावे नीमच सिटी, चौथखेड़ा, दुलाखेड़ा, काना खेड़ा, रावतखेड़ा, जैतपुरा, जमुनिया, अरनिया, झांझरवाड़ा, महू रोड़ सहित नीमच के विभिन्न क्षेत्रों के रहवासियों को गंदी व जहरीली बदबू के रूप में झेलना पड़ रहा है।
नीमच जिले के झांझरवाड़ा व रावतखेड़ा क्षेत्र में स्थापित धानुका के प्लांट वर्ष 2021 के बाद से लगातार संचालन में है। प्रारंभिक चरण में इसे स्थानीय रोजगार और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा गया, लेकिन अब यह प्लांट पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। क्षेत्रीय पर्यावरणीय निगरानी रिपोर्टों और स्थानीय निवासियों के अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट हो रहा है कि प्लांट से निकलने वाला धुआं, रासायनिक गैसें और अपशिष्ट पदार्थ आस-पास के इलाकों की हवा और जल स्रोतों को दूषित कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के दस्तावेज़ों में धानुका बायोटेक का नाम CEMS (Continuous Emission Monitoring System) और CEQMS (Continuous Effluent Quality Monitoring System) सूची में दर्ज है। लेकिन रिपोर्टों में कई बार इसकी स्थिति “Partial” या “Non-Active” बताई गई है, जो यह दर्शाती है कि उत्सर्जन निगरानी प्रणाली लगातार सक्रिय नहीं रही। इससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि वायु में छोड़ी जा रही गैसों और धुएं की मात्रा तय मानकों से अधिक हो सकती है।
स्थानीय ग्रामीणों और किसानों का कहना है कि संयंत्र के आसपास के खेतों में धूल और राख की परत जमने लगी है। कई परिवारों ने सांस की तकलीफ, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायतें दर्ज कराई हैं। गांवों में बच्चों और बुजुर्गों में खांसी व अस्थमा के मामले भी बढ़े हैं। डॉक्टरों का मानना है कि यह वायु की गुणवत्ता में गिरावट का सीधा परिणाम है।
नीमच की हवा में सल्फर-डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 व PM10) की मात्रा 2021 के बाद क्रमिक रूप से बढ़ी है। इन तत्वों की मात्रा 2024-25 तक कई बार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के तय सीमा से अधिक दर्ज की गई। इससे न केवल वायु प्रदूषण का स्तर ऊंचा हुआ है, बल्कि आसपास के जल स्रोतों में भी रासायनिक अवशेष पाए गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्लांट में Zero Liquid Discharge System (ZLD) और Effluent Treatment Plant (ETP) के दावे भले किए जा रहे हों, लेकिन उनकी कार्यक्षमता और नियमित निगरानी पर गंभीर सवाल हैं। यदि इन इकाइयों का संचालन पूर्ण रूप से न हो तो गन्ना, मक्का और अन्य फसलों की मिट्टी की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ सकता है।
जबकि धानुका या कोई भी उद्योग जो इस श्रेणी के हो उनको पारदर्शी रूप से अपना उत्सर्जन डेटा MPPCB और CPCB के सार्वजनिक पोर्टल पर नियमित साझा करना चाहिए। साथ ही आसपास के गांवों में स्वतंत्र वायु गुणवत्ता परीक्षण कराए जाने चाहिए ताकि स्थानीय जनजीवन पर पड़ रहे वास्तविक प्रभाव का आंकलन किया जा सके।
नीमच क्षेत्र के नागरिकों का कहना है कि उद्योग विकास का स्वागत है, परंतु पर्यावरण और स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। प्रशासन को चाहिए कि वह नियमों के पालन और उत्सर्जन मानकों की निगरानी में सख्ती बरते ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम रह सके।
इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि चाहे कितने भी नियमों के पालन की बात कही जाए लेकिन बाद में उनके अनुपालना पर एक संशय बना ही रहता है। सारे दावे खोखले ही निकलते है।