छोटीसादड़ी की 11 साल की बेटी जिनिशा आंजना ने साउथ अफ्रीका में लहराया तिरंगा सुबह 4 बजे की साधना, 6 महीने का कठिन अभ्यास और आत्मविश्वास ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान जिनिशा बोली- सपनों की कोई उम्र नहीं, बस हौसले चाहिए छोटीसादड़ी। सफलता न उम्र देखती है, न साधन वह सिर्फ समर्पण, अनुशासन और जिद पहचानती है। इस बात को प्रतापगढ़ जिले के छोटे से शहर छोटीसादड़ी की 11 वर्षीय नन्ही तैराक जिनिशा आंजना ने पूरी दुनिया के सामने साबित कर दिया है। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद और मोबाइल की दुनिया में उलझे रहते हैं, उस उम्र में जिनिशा ने सुबह 4 बजे उठकर सपनों की ऐसी तैयारी की, जिसने उसे देश की सीमाओं से बाहर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया। जिनिशा आंजना ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए साउथ अफ्रीका के मोसेल बे में आयोजित अंतरराष्ट्रीय तैराकी चैंपियनशिप में भाग लेकर न केवल देश का मान बढ़ाया, बल्कि यह साबित कर दिया कि सपनों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। छोटीसादड़ी जैसे छोटे शहर से निकलकर जिनिशा आंजना ने वह कर दिखाया, जो कई बार बड़े शहरों और बेहतर संसाधनों वाले खिलाड़ी भी नहीं कर पाते। 4 दिसंबर को जिनिशा ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए मोसेल बे, साउथ अफ्रीका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय तैराकी चैंपियनशिप में भाग लिया और वैश्विक मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की जीत थी, जो वर्षों की मेहनत, असफलताओं और अटूट विश्वास से होकर गुजरा। हार से घबराई नहीं, हार को सीढ़ी बनाया जिनिशा के पिता सुनील आंजना बताते हैं कि वर्ष 2022 में उसने पहली बार चित्तौड़गढ़ में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया। इसके बाद 2023 में जयपुर में दो बार राज्य स्तरीय और स्विमिंग फेडरेशन की प्रतियोगिताएं खेलीं, लेकिन हर बार परिणाम मनमुताबिक नहीं रहा। यहीं से जिनिशा की असली कहानी शुरू होती है। उसने हार को अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत माना। उसने तय कर लिया कि अगर सफल होना है, तो आराम और समझौतों को पीछे छोड़ना होगा। गर्मी की छुट्टियां खेल में नहीं, पसीने में बदलीं जानकारी में सामने आया है कि जहां बच्चे गर्मी की छुट्टियों में घूमने-फिरने और मौज-मस्ती में समय बिताते हैं, वहीं जिनिशा ने अपनी छुट्टियों को कड़ी ट्रेनिंग में बदल दिया। पिछले 6 महीनों तक वह रोजाना सुबह 4 बजे उठकर घर से निकलती, पांच बजे नीमच के स्विमिंग पूल पहुंचती और लगातार 4 घंटे अभ्यास करती। न मौसम की परवाह, न थकान का बहाना। बिना एक दिन छोड़े उसने यह कठिन दिनचर्या निभाई। राष्ट्रीय मंच से अंतरराष्ट्रीय उड़ान इस