​नीमच। जिले में रेत के अवैध कारोबार और परिवहन ने अब एक संगठित सिंडिकेट का रूप ले लिया है। राजस्थान की सीमा से सटे नयागांव बॉर्डर के रास्ते नीमच शहर में दाखिल हो रहे रेत के डंपरों ने न केवल शासन के नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। हाल ही में जनसुनवाई में पहुंची एक शिकायत ने विभाग के भीतर मचे हड़कंप और कथित ‘लेन-देन’ के खेल को उजागर कर दिया है।
​1. खेल ‘पर्ची’ का: एक रॉयल्टी, चार शिकार
​शिकायत में रेत माफिया के जिस शातिर तरीके का खुलासा हुआ है, वह चौंकाने वाला है। माफिया द्वारा ‘एक पर्ची, अनेक चक्कर’ का फॉर्मूला अपनाया जा रहा है।
​फर्जीवाड़ा: कागजों पर रॉयल्टी पर्ची केवल एक डंपर के लिए काटी जाती है, लेकिन उसी एक पर्ची की आड़ में 3 से 4 डंपर अवैध रूप से सीमा पार कराए जा रहे हैं।
​गंतव्य का खेल: इन पर्चियों पर माल खाली करने का स्थान रतलाम या उज्जैन दर्शाया जाता है, ताकि लंबी दूरी का बहाना बनाकर पर्ची को घंटों तक ‘एक्टिव’ रखा जा सके। लेकिन हकीकत में यह रेत नीमच शहर और आसपास के इलाकों में ही अवैध रूप से खपा दी जाती है।
​2. ओवरलोडिंग: सड़कों पर मौत का तांडव और राजस्व की लूट
​राजस्व चोरी के साथ-साथ यह माफिया सड़कों की उम्र और आम जनता की जान से भी खिलवाड़ कर रहा है।
​दोगुना भार: जिन डंपरों की भार क्षमता 35 से 40 टन है, उनमें बेखौफ होकर 70 से 80 टन रेत भरी जा रही है।
​क्षतिग्रस्त सड़कें: क्षमता से अधिक भार के कारण करोड़ों की लागत से बनी सड़कें समय से पहले दम तोड़ रही हैं।
​दुर्घटनाओं को न्योता: ओवरलोड डंपरों के कारण आए दिन सड़क हादसे हो रहे हैं, जो सीधे तौर पर आम नागरिकों की सुरक्षा पर प्रहार है।
​3. विभाग मौन या मिलीभगत?
​नियम कहते हैं कि ओवरलोडिंग पाए जाने पर वाहन को तुरंत जब्त कर खनिज विभाग के सुपुर्द किया जाना चाहिए। लेकिन नीमच में धरातल पर स्थिति इसके विपरीत है।
​दिखावे की कार्रवाई: पुलिस, आरटीओ (RTO) और खनिज विभाग द्वारा जाँच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
​गठजोड़ के आरोप: जनसुनवाई में हुई शिकायत में साफ तौर पर विभागों के बीच ‘अघोषित गठजोड़’ की बात कही गई है, जिसके चलते इन डंपरों को शहर में बेधड़क घूमने का ‘खुला लाइसेंस’ मिला हुआ है।
​4. अब कलेक्टर के फैसले का इंतज़ार
​इस पूरे मामले में अब सबकी नजरें नीमच कलेक्टर पर टिकी हैं। जिले के सरकारी खजाने को लग रहे इस करोड़ों के चूने और माफियाओं के बढ़ते हौसले पर लगाम कसने के लिए कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
​बड़ा सवाल: क्या प्रशासन इस सिंडिकेट को ध्वस्त कर दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई करेगा, या फिर यह शिकायत भी लालफीताशाही की भेंट चढ़कर फाइलों में दफन हो जाएगी?