नीमच/मनासा। जिले के मनासा में गुरुवार को अवैध अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई उस समय भावनात्मक और मानवीय संकट में बदल गई, जब श्मशान रोड स्थित झुग्गी बस्ती पर नगर परिषद का बुलडोज़र चलाया गया। कार्रवाई के दौरान लगभग 2 हेक्टेयर शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया, जिससे करीब 30 परिवारों के आशियाने जमींदोज हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कार्रवाई अचानक शुरू हुई, जिससे कई परिवारों को अपना सामान तक समेटने का पर्याप्त समय नहीं मिल सका। कुछ ही मिनटों में रसोई का राशन, बच्चों की किताबें, कपड़े और घरेलू सामान मलबे में दब गए। जिन कच्चे-पक्के घरों में वर्षों से परिवार रह रहे थे, वहां अब सिर्फ टूटी दीवारें और बिखरा सामान नजर आ रहा है।
रोते-बिलखते परिवार, खुले आसमान तले रात
कार्रवाई के बाद सामने आए दृश्य हृदयविदारक थे। महिलाएं और बच्चे रोते-बिलखते नजर आए। पीड़ितों का आरोप है कि उन्हें पूर्व सूचना या पर्याप्त समय नहीं दिया गया। उनका कहना है कि अचानक बुलडोज़र चलने से वे न तो अपना सामान निकाल पाए और न ही कोई वैकल्पिक ठिकाना तलाश सके। बरसात और ठंड के मौसम के बीच खुले आसमान के नीचे रहने की मजबूरी ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है।
कलेक्टर कार्यालय पहुंची गुहार
बेघर हुए परिवार शुक्रवार को जिला मुख्यालय पहुंचे और कलेक्टर कार्यालय के बाहर न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने नगर परिषद के अधिकारियों और कर्मचारियों पर जल्दबाजी में कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए मांग की कि या तो उन्हें उसी स्थान पर रहने दिया जाए या वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए।
नगर परिषद का पक्ष
वहीं मनासा नगर परिषद के सीएमओ संजय पाटीदार ने बताया कि श्मशान रोड पर लगभग 2 हेक्टेयर शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाया गया है। उनके अनुसार संबंधित लोगों को पूर्व में नोटिस जारी किया गया था और नियमानुसार कार्रवाई की गई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त भूमि पर एक शासकीय परियोजना प्रस्तावित है, जिसके चलते अतिक्रमण हटाना आवश्यक था।
पुनर्वास पर उठे सवाल
कानूनी प्रक्रिया के तहत अतिक्रमण हटाना प्रशासनिक अधिकार है, लेकिन सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि क्या ऐसे मामलों में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए थी? सामाजिक संगठनों का कहना है कि गरीब परिवारों को बेघर करने से पहले मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या बेघर हुए परिवारों को राहत और पुनर्वास मिलेगा, या यह मामला भी मलबे में दबे सपनों के साथ ठंडा पड़ जाएगा?