(कमलेश सारड़ा) ✍🏻
राजस्थान के उस एक ऑडियो ने केवल किसी एक दल के घाव नहीं कुरेदे हैं, बल्कि नीमच जिले की राजनीतिक बिसात पर बैठे हर उस मोहरे को भीतर तक झकझोर दिया है, जिसे हम आदर से ‘कार्यकर्ता’ कहते हैं। यह नीमच की राजनीति का सबसे कड़वा और नंगा सच है कि उपेक्षा और बेबसी की यह स्थिति कमोबेश दोनों प्रमुख दलों में एक समान है। झंडे के रंग भले ही अलग हों, विचारधाराओं के नारे भले ही जुदा हों, लेकिन उस झंडे का डंडा थामने वाले हाथों की पीड़ा और आंखों की नमी बिल्कुल एक जैसी है।
यह किसी गुट या दल की शिकायत नहीं, बल्कि नीमच के हर उस जमीनी कार्यकर्ता के ‘मन की बात’ है, जो आज खुद को हाशिए पर खड़ा, एक ठगा हुआ मुसाफिर महसूस कर रहा है।
*चुनाव के ‘देवता’ और सत्ता के ‘अनाथ’*।
चुनाव के वक्त जो कार्यकर्ता पार्टी की ‘रीढ़ की हड्डी’ होता है, जिसे ‘देवदुर्लभ’ कहकर मंचों से सम्मानित किया जाता है, चुनाव बीतते ही वह अचानक अनाथ कैसे हो जाता है? दोनों ही प्रमुख दलों का कार्यकर्ता आज इस मार्मिक सवाल से जूझ रहा है।
एक आम कार्यकर्ता अपना घर, अपना व्यापार और कई बार अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों से भी दुश्मनी मोल लेकर अपनी पार्टी और अपने नेता का बचाव करता है। वह चिलचिलाती धूप में अपनी जेब का पेट्रोल जलाकर रैलियों में भीड़ बढ़ाता है। उसका खून तब खौलता है जब उसकी पार्टी पर कोई आंच आती है। लेकिन, जब उसी कार्यकर्ता पर कोई निजी या प्रशासनिक गाज गिरती है, थाने या तहसील के किसी बाबू के सामने जब उसके आत्मसम्मान को कुचला जाता है, तब उसे बचाने के लिए उसके अपने ‘माननीय’ के फोन की घंटी नहीं बजती। तब वह खुद को नितांत अकेला पाता है।
*मजबूरियों के नाम पर छलता हुआ अपनापन*।
माननीयों की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं। संगठन के कड़े निर्देश, प्रोटोकॉल या सत्ता के समीकरणों में उनके हाथ बंधे हो सकते हैं। लेकिन एक सच्चा कार्यकर्ता कभी अपने नेता से कानून तोड़ने या नाजायज काम करने की जिद नहीं करता। वह तो सिर्फ उस ‘आत्मीयता’ का भूखा होता है, जो उसे यह अहसास दिलाए कि विपत्ति के समय उसका नेता उसके कंधे पर हाथ रखने आएगा।
जब वातानुकूलित गाड़ियों के शीशे एक आम कार्यकर्ता को देखकर चढ़ जाते हैं, या जब बड़े नेताओं के बंगलों के दरवाजे उसके लिए बंद हो जाते हैं, तो वह कार्यकर्ता बाहर सीढ़ियों पर बैठकर किसी से शिकायत नहीं करता; वह केवल अपने उस खोखले वजूद पर रोता है, जिसे उसने अपना सब कुछ लुटाकर उस पार्टी के लिए गढ़ा था। कांग्रेस हो या भाजपा, नीमच के हर उस गली-मोहल्ले के कार्यकर्ता की यही अनकही दास्तान है, जो मंच पर बैठे नेताओं की जय-जयकार करते हुए अपना गला रुंधा चुका है।
*भावनात्मक जुड़ाव का टूटता धागा*।
नेताओं को यह समझना होगा कि कार्यकर्ता कोई ‘इवेंट मैनेजमेंट’ कंपनी का दिहाड़ी मजदूर नहीं है। वह भावनाओं, उम्मीदों और एक गहरी निष्ठा से बंधा इंसान है। जब कोई दूसरा नेता (जैसे गौतम दक का प्रसंग) अपने अदने से कार्यकर्ता के लिए सिस्टम से भिड़ता हुआ नजर आता है, तो नीमच के दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के मन से एक गहरी और मार्मिक आह निकलती है— *”काश! मेरा नेता भी मेरे लिए ऐसे ही खड़ा होता।”*
*नीमच के नेतृत्व के लिए एक खामोश चेतावनी*
नीमच जिले के दोनों प्रमुख दलों के शीर्ष नेतृत्व और माननीयों को इस खामोश रुलाई को अब सुनना ही होगा। राजनीति केवल बूथ प्रबंधन और जोड़-तोड़ का गणित नहीं है; यह विश्वास का वह कच्चा धागा है जो एक बार टूट जाए तो लाख गांठें बांधने पर भी पहले जैसा नहीं होता।
जिस दिन दरी बिछाने वाले, पोस्टर चिपकाने वाले और नारे लगाने वाले इन आम कार्यकर्ताओं ने अपने आंसुओं को पोंछकर यह तय कर लिया कि अब वे सिर्फ अपने और अपने परिवार के लिए जिएंगे, उस दिन बड़े-बड़े नेताओं के सिंहासन धूल फांकते नजर आएंगे। यह किसी की बगावत नहीं, बल्कि अपना खून-पसीना सींचने वाले एक हताश और थके हुए कार्यकर्ता की अंतिम ‘मन की बात’ है।
दरी बिछाने वाले हाथों की खामोश टीस: जिले के हर दल के कार्यकर्ता के ‘मन की बात’।
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