चित्तौड़गढ़ नगर परिषद चुनाव में टिकट वितरण के बाद अब असली चर्चा चुनाव मैदान से ज्यादा उन समाजों और कार्यकर्ताओं की हो रही है, जिन्हें भाजपा और कांग्रेस दोनों ने टिकट वितरण में अपेक्षित महत्व नहीं दिया। हर चुनाव में टिकट मिलने वालों से ज्यादा चर्चा टिकट नहीं मिलने वालों की होती है। इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। कई जाति और सामाजिक समूह अपने प्रतिनिधित्व को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। सवाल यह है कि चुनाव के दिन यह नाराजगी किस दिशा में जाएगी।

कांग्रेस ने अनुसूचित जाति वर्ग के उम्मीदवार को टिकट दिया है, लेकिन राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव रणजीत लोट का टिकट नहीं मिलना भी चर्चा में है। रणजीत लोट ऐसे नेता नहीं हैं जो टिकट नहीं मिलने पर घर बैठ गए हों या पार्टी के खिलाफ खड़े हो गए हों। कांग्रेस में काम करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। आज तक विवाह नहीं किया और अपना पूरा समय राजनीति तथा संगठन को दिया। टिकट नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने पार्टी के फैसले को स्वीकार किया है और अब कांग्रेस का बोर्ड बनाने के लिए पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। यह बात अपनी जगह है कि रणजीत लोट पार्टी के साथ मजबूती से खड़े हैं, लेकिन उनके समर्थक और समाज के लोग इस निर्णय को किस रूप में लेते हैं, यह चुनाव में महत्वपूर्ण रहेगा। दूसरी तरफ भाजपा भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है। टिकट वितरण में वहां भी कई जाति और सामाजिक समूहों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई हैं। इसलिए यह मान लेना कि असंतोष केवल कांग्रेस में है, सही तस्वीर नहीं होगी। असल चुनाव अब प्रत्याशियों के साथ साथ उन नाराज कार्यकर्ताओं और समाजों की भूमिका से भी तय होगा, जिन्हें लगता है कि उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला। राजनीतिक चर्चाओं में फिलहाल भाजपा का बोर्ड बनने की संभावना ज्यादा जताई जा रही है। इसके पीछे भाजपा की चुनावी तैयारी, स्थानीय समीकरण और कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौतियों को कारण माना जा रहा है। लेकिन राजनीति में मतदान से पहले अंतिम फैसला लिख देना भी ठीक नहीं होगा। कांग्रेस यदि अपने कार्यकर्ताओं और विभिन्न सामाजिक समूहों को एकजुट रखने में सफल रहती है तो मुकाबला बदल सकता है। वहीं भाजपा को भी अपने नाराज लोगों को संभालना होगा। चित्तौड़गढ़ का यह चुनाव एक बात जरूर तय करेगा कि राजनीतिक दल टिकट बांटते समय समाजों की ताकत को कितना समझ पाए और जिन लोगों को नजरअंदाज किया गया, उन्होंने मतदान के दिन अपनी नाराजगी किस रूप में दिखाई। फिलहाल चर्चाएं बहुत हैं और दावे भी बहुत हैं। भाजपा का बोर्ड बनने की संभावना मजबूत बताई जा रही है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा मतदाता के हाथ में होता है।