"दम" तोड़ते नीमच के बड़े अस्पताल में रिश्वत देकर भी नहीं मिल रहा उचित इलाज...?,घुस खाकर भी नहीं निभाई जिम्मेवारी और "लाड़" कि "क्रूरता" ने छीन ली जिंदगी,निवास पर चल रहा निजी अस्पताल "अरावली" मेडिकल पर लेनदेन और सरकारी अस्पताल में मौत की "डिलीवरी"मोटी रकम देकर भी स्वयं को मौत के मुंह में धकेलने, सरकारी बूचड़ खाने का रुख आखिर क्यों...?
25 Nov 2025
NEEMUCH NEWS
दीपक चौहान । नीमच । यह कोई पहली मर्तबा नहीं है, जब नीमच जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में मरीज की जान जाने से जुड़ी क्रूर लापरवाही सामने आई है...इस तरह के अनगिनत मामलों को नीमच के इस बड़े अस्पताल में एक सामान्य घटना के तौर पर अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन द्वारा देखा जाता रहा है... हां डाक्टरों की लापरवाही पर हंगामे जरूर होते है, और दोषियों पर कार्यवाही का आश्वासन भी दिया जाता है...लेकिन उग्र भीड़ को आश्वस्त करने का प्रशासन का यह फार्मूला पुराना है, जहां की मुआवजे की मांग पर अड़ने वाले परिजन और भीड़ को नियंत्रित और शांत तो कर दिया जाता है... लेकिन "लाड़" प्यार से मरीज के परिजनों की जेब पर डाक डालकर भी लापरवाही करने वाले "लाड़ धाकड़" जैसे क्रूर चिकित्सक के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाया नहीं जाता...?
अमूमन डॉक्टरों की डिक्शनरी में इलाज के दौरान मौत होने को स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन अगर मौत किसी घोर लापरवाही के चलते हो तो फिर सवाल भी खड़े होते है...घूसखोर डाक्टरों की क्रूरता भी नजर आती है.. सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों से उपचार या ऑपरेशन के बदले मोटी रकम भी वसूलते है...और बदले में उसे उचित उपचार देने की बजाय लापरवाही की हद पार करते हुए, किसी की भी हस्ती खेलती जिंदगी से खेल जाते है...?
यानी कि घुस खाकर भी अपने काम में ईमानदारी से जिम्मेवारी नहीं निभा पाते...ऐसी कई "टीना" जिला अस्पताल में लापरवाही व इलाज के अभाव में दम तोड़ चुकी है...जहां "दम" तोड़ती हुई बड़े अस्पताल की व्यवस्थाओं को देखकर भी प्रशासन या जनप्रतिनिधियों का दम नहीं "घुटता" सोचिए अगर जिला अपस्ताल में घुस देकर इलाज कराने वालों का यह हाल है, तो फिर अस्पताल की व्यस्थाओं के भरोसे अस्पताल में भर्ती मरीज को तो अस्पताल "अस्तबल" से बत्तर ही लगता होगा... जहां जान तो "हलक" में ही अटकी रहती होगी...?
बेशर्मी और क्रूरता की हद पार करने वाला जिला अस्पताल का चिकित्सा प्रबंधन क्या कभी मानवीय संवेदनाओं को समझेगा...क्या निजी अस्पतालों की और रुख करने वालों को इस बात का इल्म भी कभी होगा कि प्रायवेट अस्तपालों की तुलना में सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाएं अब दुरुस्त हो चुकी है...?
यहां हैरान परेशान और सोचने पर मजबूर करने वाली बात यह भी है कि जब आपको सरकारी अस्पताल में (अस्तबल) में मोटी रकम रिश्वत के रूप देकर भी जान से हाथ ही धोना है... तो फिर क्यों हम स्वयं को मौत के मुंह में धकेलने इस तरह के सरकारी "बूचड़ खाने" में उपचार कराने आ जाते है...?