मध्यप्रदेश पुलिस के वो 'सिंघम' जिनकी दहाड़ से बड़े-बड़े अपराधियों के पसीने छूट जाते हैं, जो साइबर एक्सपर्ट भी हैं और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी—जी हां, हम बात कर रहे हैं योगेंद्र सिंह सिसोदिया की! अपनी जांबाजी और शातिर दिमाग से जुर्म की दुनिया में खलबली मचाने वाले नीमच कैंट के टीआई (TI) योगेंद्र सिंह सिसोदिया अब प्रमोट होकर डीएसपी (DSP) बन चुके हैं।

उनकी इस कामयाबी पर पूरा महकमा गर्व महसूस कर रहा है। आइए जानते हैं इस 'सुपरकॉप' की वो जांबाज कहानियां, जिन्हें सुनकर अपराधियों की रूह कांप जाती है!
इस जांबाज के नाम दर्ज हैं रोंगटे खड़े कर देने वाले ये कारनामे:- जानिए!

मरे हुए को किया 'जिंदा' गिरफ्तार: -
जिस कुख्यात तस्कर बंशी गुर्जर को पुलिस कागजों में मार चुकी थी, उसे योगेंद्र सिंह ने साइलेंट तरीके से जिंदा दबोचकर फर्जी एनकाउंटर का सनसनीखेज भंडाफोड़ कर दिया!

कमल राणा का किया खेल खत्म: वर्ष 2016 में ₹50 हजार के इनामी और राजस्थान-एमपी पुलिस की नाक में दम करने वाले गैंगस्टर कमल राणा को रणथंभौर के जंगलों से घसीट लाए।

रूस्तम अवॉर्ड से नवाजे गए: -
साल 2022 में नीमच में रहते हुए उनकी बेमिसाल बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित रूस्तम जी अवॉर्ड और '12 बोर की बंदूक' देकर सम्मानित किया था।

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट: -
अपने करियर में अब तक 7-8 खूंखार इनामी बदमाशों को जेल के पीछे भेज चुके हैं और 4 खतरनाक एनकाउंटर भी कर चुके हैं।

जब 'लाश' बनकर घूम रहे तस्कर को दबोचा!
सनसनीखेज खुलासा: -
"साल 2009 में पुलिस ने दावा किया था कि तस्कर बंशी गुर्जर को बेसरा घाट पर ढेर कर दिया गया है। लेकिन जुर्म की दुनिया का यह शातिर खिलाड़ी कागजों में मरकर हकीकत में तस्करी का साम्राज्य चला रहा था। तत्कालीन आईजी उपेंद्र जैन की स्पेशल टीम में शामिल योगेंद्र सिंह सिसोदिया ने वो कर दिखाया जो नामुमकिन था। उन्होंने बेहद गोपनीय तरीके से काम करते हुए कागजों में मृत घोषित बंशी गुर्जर और घनश्याम धाकड़ को जिंदा दबोच लिया। तब जाकर पता चला कि जिस एनकाउंटर को सच माना जा रहा था, वह फर्जी था और किसी और को मार दिया गया था!

रणथंभौर के जंगलों से 'शेर' का शिकार:- 
लूट, हत्या, डकैती और तस्करी के 25 से ज्यादा मुकदमों में फरार चल रहे ₹50 हजार के इनामी गैंगस्टर कमल राणा ने दोनों राज्यों की पुलिस की नींद उड़ा रखी थी। वह फरारी काटते हुए भी डोडाचूरा की तस्करी धड़ल्ले से कर रहा था। लेकिन जैसे ही योगेंद्र सिंह सिसोदिया ने कमान संभाली, उन्होंने ईमानदार एसपी मनोज सिंह के नेतृत्व में जाल बुना और राजस्थान के रणथंभौर से इस खूंखार भेड़िये को दबोच लिया।

क्रिकेटर बनने का था सपना, किस्मत ने बना दिया 'क्राइम का काल': 
14 दिसंबर 1975 को धार जिले के कुक्षी में जन्मे योगेंद्र सिंह के खून में ही देशसेवा और वर्दी का जज्बा था। उनके पिता (66 बैच) सब इंस्पेक्टर रहे और बड़े भाई जितेंद्र सिंह सिसोदिया भी मंदसौर के पिपलियामंडी में टीआई हैं।

बचपन का सपना: -
योगेंद्र सिंह का सपना पुलिस में आना नहीं, बल्कि एक महान क्रिकेटर बनना था।
किस्मत का यू-टर्न: किस्मत के धनी योगेंद्र सिंह ने जब पहली बार सब इंस्पेक्टर की परीक्षा दी, तो पहली ही बार में सीधे सागर जिले के लिए उनका चयन हो गया।
करियर का सबसे खुशनुमा पल: -
उज्जैन में पदस्थ रहते हुए 50-50 हजार के इनामी पार्षद प्रेम यादव हत्याकांड के मुख्य आरोपियों (अजीत सेंगर और गोविंद कुशवाह) को महज एक महीने के भीतर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाना उनके जीवन का सबसे संतोषजनक पल रहा।

 'सुपरकॉप' का युवाओं और जनता को कड़ा संदेश:- 
युवाओं के लिए सीख: "आज का युग टेक्नोलॉजी का है। युवाओं को व्हाट्सएप और फेसबुक से ध्यान हटाकर अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाना चाहिए। 22 साल की उम्र तक जी-तोड़ मेहनत करें। शिक्षा ही सफलता का एकमात्र माध्यम है, वरना सब कुछ होकर भी इंसान शून्य के समान है।अपराधियों के लिए काल और जनता के लिए ढाल बनने वाले ऐसे जांबाज पुलिस ऑफिसर योगेंद्र सिंह सिसोदिया (अब डीएसपी) के जज्बे को पूरा देश सलाम करता है!