नीमच। कांग्रेस नेत्री एवं समाजसेविका श्रीमती मधु बंसल ने केंद्र की भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर तीखा हमला बोलते हुए इसे विफलताओं, जनविरोधी नीतियों और छलावे का दौर बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने अपनी नाकामियों और भ्रष्टाचार से जनता का ध्यान भटकाने के लिए देश में "अंधभक्तों की फौज" खड़ी कर दी है, जो वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंदकर सत्ता का समर्थन कर रही है।
जारी बयान में श्रीमती बंसल ने कहा कि आम नागरिक रोजमर्रा की जिंदगी में टूटी सड़कें, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार तथा स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का सामना कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद एक वर्ग सरकार की हर नीति का समर्थन करने में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन आज जो भी व्यक्ति महंगाई, बेरोजगारी या अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर सवाल उठाता है, उसे देशद्रोही, एंटी-नेशनल या एंटी-हिंदू कहकर बदनाम करने का प्रयास किया जाता है। श्रीमती बंसल ने आरोप लगाया कि भाजपा समर्थकों का एक बड़ा वर्ग सरकार के चुनावी घोषणापत्र, संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों तथा आर्थिक मुद्दों की जानकारी के बजाय सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर प्रसारित भ्रामक संदेशों पर अधिक भरोसा कर रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में जागरूक नागरिकों को तथ्यों के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करना चाहिए, न कि प्रचार के आधार पर। कांग्रेस नेत्री ने कहा कि इतने बड़े और प्रतिभाशाली देश में यह मान लेना कि कुछ चुनिंदा नेताओं के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लोकतांत्रिक सोच के विपरीत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना आधार के "बिका हुआ" कहकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। साथ ही उन्होंने कथावाचकों और स्वघोषित बाबाओं की राजनीतिक टिप्पणियों को बिना तथ्य जांचे सच मानने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। श्रीमती बंसल ने कहा कि भाजपा सरकार की आलोचना होने पर अक्सर "विकल्प क्या है?" का तर्क दिया जाता है, जबकि लोकतंत्र में जनता को सरकार से जवाब मांगने और बेहतर विकल्प चुनने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि विधायक, सांसद, मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी जनता के टैक्स से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग करते हैं, इसलिए वे जनता के सेवक हैं, न कि पूजनीय व्यक्ति। जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगना चाहिए और समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से अपना निर्णय देना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से अंधभक्ति छोड़कर लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना के अनुरूप जागरूक नागरिक की भूमिका निभाने का आह्वान किया।