नीमच जिले से महज 10 किलोमीटर दूर पिपलियाहाड़ा गांव में जिम्मेदारों की अनदेखी का खामियाजा ग्रामीण भुगत रहे हैं। गिरदोड़ा पंचायत के अंतर्गत आने वाले इस गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए आज तक पर्याप्त और पक्का रास्ता नहीं बन पाया है। हालात ऐसे हैं कि जिंदा लोगों के लिए रास्ता न सही, अब मृतकों की अंतिम यात्रा भी कीचड़ और घास के बीच से होकर गुजरने को मजबूर है। गांव में किसी व्यक्ति की मौत होने के बाद शव को श्मशान तक ले जाना ग्रामीणों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। कच्चे, कीचड़ भरे और घास से अटे रास्ते से होकर अंतिम यात्रा निकालनी पड़ती है। बारिश के दिनों में परेशानी और बढ़ जाती है। तस्वीरें खुद बयां कर रही हैं जिम्मेदारों की 'विकास की कहानी'। श्मशान घाट तक लकड़ियां पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर को भी रास्ते में आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा है। मजबूरी में ट्रैक्टर को काफी मशक्कत के बाद श्मशान तक ले जाना पड़ रहा है।
बुधवार को गांव में एक महिला की मौत के बाद जब अंतिम यात्रा निकली तो ग्रामीणों को फिर वही परेशानी झेलनी पड़ी। कीचड़ और अव्यवस्थित रास्ते से होते हुए शव को श्मशान तक पहुंचाया गया। इतना ही नहीं, अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां पहुंचाने में भी ग्रामीणों को खासी मशक्कत करनी पड़ी।
ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या वर्षों से बनी हुई है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों तक ग्रामीणों की परेशानी की आवाज नहीं पहुंच रही। सवाल यह है कि जब गांव से श्मशान तक एक उचित रास्ता बनाना भी जिम्मेदारों के लिए संभव नहीं है, तो विकास के बड़े-बड़े दावों का आखिर क्या मतलब? 

विडंबना देखिए—जिस रास्ते पर इंसान की आखिरी यात्रा भी सम्मान से नहीं निकल पा रही, उस रास्ते की बदहाली पर आखिर कब जिम्मेदारों की नजर पड़ेगी?
ग्रामीणों ने मांग की है कि श्मशान घाट तक तत्काल पक्का और सुगम रास्ता बनाया जाए, ताकि किसी परिवार को अपने प्रियजन की अंतिम यात्रा के दौरान इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।