नीमच। अभी कुछ दिन पूर्व जंतर-मंतर पर देश की युवा शक्ति, जिसे आज जेन जी (Gen Z) के नाम से पहचाना जा रहा है, ने बड़ा आंदोलन किया और देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी। यह स्पष्ट संकेत है कि अब युवा पीढ़ी को नजरअंदाज करना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रह गया है। भारत ही नहीं, बल्कि कई पड़ोसी देशों में भी युवाओं के आंदोलन तेज हुए हैं। दुनिया अब यह समझ रही है कि नई पीढ़ी केवल दर्शक नहीं, बल्कि परिवर्तन की सक्रिय शक्ति है।

नीट परीक्षा के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन केवल पेपर लीक का मामला नहीं था। यह उस पीढ़ी का आक्रोश था जो कठिन मेहनत से अपना भविष्य बनाना चाहती है, लेकिन बार-बार व्यवस्था की खामियों से खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।

जंतर-मंतर से उठी यह चिंगारी देश के विभिन्न हिस्सों में दिखाई दे रही है। झारखंड के छात्र आंदोलनों को भी जेन जी का समर्थन मिल रहा है। भोपाल में नर्सिंग छात्र अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। कई स्थानों पर स्कूली बच्चे तिरंगा लेकर कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच रहे हैं और स्कूल जाने के मार्ग को दुरुस्त कराने की मांग कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि आज का युवा केवल व्यक्तिगत हित नहीं, बल्कि सार्वजनिक समस्याओं पर भी मुखर हो रहा है।

देश की राजनीतिक पार्टियां अब यह समझ चुकी हैं कि डिजिटल पीढ़ी को किसी भी दृष्टि से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि आगामी 15 अगस्त 2026 को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में भी युवाओं को केंद्र में रखना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

लंबे समय तक भारतीय राजनीति धर्म और जाति के समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। आने वाले वर्षों में लगभग 38 करोड़ युवा मतदाता ऐसे होंगे जो जेन जी की सोच से प्रभावित होंगे। यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर अपनी राय रखती है, तथ्यों की जांच करती है और जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरकर आंदोलन भी करती है।

आज का युवा मुफ्त की योजनाओं के आकर्षण से पूरी तरह प्रभावित नहीं होता। वह समझ चुका है कि ऐसी योजनाएं क्षणिक राहत दे सकती हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। उसे शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। वह चुनावी वादों के बजाय व्यावहारिक नीतियां और परिणाम चाहता है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं के मतदान व्यवहार ने कई बार सत्ता परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई है। उसी प्रकार जेन जी भी भविष्य में किसी विशेष दल के पक्ष में संगठित समर्थन दे सकती है। यही कारण है कि लगभग सभी राजनीतिक दल युवाओं से सीधे जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी कहा कि आंदोलनों के दौरान युवाओं की बात सुननी चाहिए। उन्होंने युवाओं को संघ से जुड़ने का आह्वान किया। वहीं एबीवीपी भी छात्र-युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए सक्रिय है।

दूसरी ओर, संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के बीच पहुंच रहे हैं। कांग्रेस पार्टी सोशल मीडिया, पीपीटी प्रस्तुतियों, पॉडकास्ट और "छात्रों की गूंज" जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। प्रियंका गांधी को भी विशेष रूप से युवा संपर्क की जिम्मेदारी दी गई है। समाजवादी पार्टी डिंपल यादव को आगे कर रही है और क्षेत्रीय दल भी युवा मतदाताओं को साधने की रणनीति बना रहे हैं।

वर्ष 2027 में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में जेन जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्रों में शिक्षा, रोजगार, स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल अवसर और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया को प्रमुख स्थान देना होगा। साथ ही युवाओं को चुनाव में प्रतिनिधित्व देकर उन्हें राजनीतिक भागीदारी का वास्तविक अवसर भी देना पड़ेगा।

अब स्थिति यह है कि जेन जी केवल चुनावी वादों का विषय नहीं रही, बल्कि चुनावी फैसलों को प्रभावित करने वाली शक्ति बनती जा रही है। जो राजनीतिक दल युवाओं की आकांक्षाओं, असुरक्षाओं और सपनों को समझकर ठोस नीतियां प्रस्तुत करेगा, वही आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी राजनीतिक बढ़त हासिल कर सकता है। नई पीढ़ी बदलाव चाहती है, और भारतीय राजनीति को अब उस बदलाव की भाषा सीखनी ही होगी।