नीमच। (कपिल सिंह चौहान) विगत वर्षों में शहर के एकमात्र नदी-स्वरूपा नाले के पाट को छोटा करके स्कूल खड़ा कर दिया गया और उसकी आड़ में कुछ भूखंड भी काट दिए गए। शहर हित की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये लोग आखिर शहर के प्रति कितने जागरूक और जिम्मेदार हैं? आधे नाले पर कब्जा करके बने स्कूल में पढ़ने वाला विद्यार्थी पर्यावरण के प्रति क्या खाक जागरूक होगा? जो लोग स्कूल की इमारत खड़ी करने के लिए शहर के इतने बड़े और उपयोगी नाले को 'जीम' गए, उस स्कूल का बच्चा बचपन से यही सीखेगा कि रसूख के दम पर प्राकृतिक संसाधनों का बेदर्दी से दोहन कैसे किया जाता है। फिर विद्या और संस्कार तो धरे के धरे रह गए! जिन्हें प्राकृतिक संसाधनों का मोल तक पता नहीं, वे मंचों पर खड़े होकर मातृभूमि और राष्ट्रप्रेम पर भाषण झाड़ते शोभा नहीं देते।
*मैदान लीलने हेतु शर्मनाक कुतर्क से पुलिस और प्रशासन की हो रही मट्टी पलीत*
इधर एक विध्यालय निर्माण के लिए पिछले 4 वर्षों में शहर के भूमाफियाओं द्वारा कई जगहों से प्रशासनिक एजेसियों को खदेड़ा गया, उनके खिलाफ सत्तापक्ष या विपक्ष का कोई आदमी एक शब्द नहीं बोल रहा है…
और ले देकर बेचारे खिलाड़ी, बच्चे, यहाँ घुमने वाले बुजुर्ग और मैदान बचाने की बात करने वाले निशाने पर हैं, क्यों ? शहर के बीचो-बीच स्थित एक विशाल रिक्त स्थान को 'खेल मैदान' के रूप में संरक्षित करने की मांग क्या उठी, उस मैदान को लील जाने को आतुर पक्ष के चंद तथाकथित नेताओं ने ऐसे शर्मनाक तर्क देने शुरू कर दिए, जिन्होंने अपनी ही सरकार में पुलिस और प्रशासन की मट्टी पलीद कर दी है।
*ये कुतर्क दे रहे हैं कि "उस मैदान में बोतलें खुलती हैं!"*
शायद इन्हें यह बखूबी पता होगा, गर ये खुद रात के अंधेरे वहां मंडराते होंगे । लेकिन सवाल यह है कि यदि शहर के हर कोने और हर मैदान में शराब की बोतलें खुल रही हैं ऐसे हालात हैं, तो क्या सभी जगह कांक्रीट निर्माण कर दें ? लोग मैदानों में शराब पी रहे तो इनकी पुलिस और प्रशासन, भांग खाकर कहां लोट लगा रही है? मैदान परिसर में दो-दो छात्रावास मौजूद हैं, वहां के अधीक्षकों से इतना भी नहीं होता कि कोई नशेड़ी दिखे तो '100 या 112 डायल' कर दें? या फिर इनके शासन में पुलिस भी इन नशेड़ियों से मिली हुई है?
एक बहुउपयोगी मैदान के खेल, सेहत, खुली आबोहवा, सुबह-शाम के अभ्यास और सुकून से जुड़े सकारात्मक पहलुओं को दरकिनार कर इन्हें सिर्फ शराब की बोतलें ही दिखाई दे रही हैं… कितने अजीब और घटिया शौक हैं इन कुतर्क करने वालों के!
*जमीन किसकी है और मंशा क्या थी?*
दूसरा कुतर्क यह दिया जा रहा है कि "स्कूल की जमीन पर स्कूल ही तो बन रहा है!" अरे, कौन कह रहा है कि यह जमीन शिक्षा विभाग की नहीं है? लेकिन जरा यह बताओ कि इस क्रमांक-1 स्कूल की जमीन पर क्रमांक- 1 स्कूल न बनाकर उसे कहीं और क्यों बनाया गया था? यह पूछोगे तो सच सामने आएगा कि बीते दशकों से ही इस मैदान को संरक्षित करने का मन बना लिया गया था।
बीते दशकों में इस मैदान ने शहरवासियों के लिए अपनी बहुउपयोगिता बार-बार साबित की है। ऐसे में, इसके 'उद्देश्य परिवर्तन' (Land Use Change) की मांग उठाकर इसे खेल मैदान के रूप में संरक्षित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? फिर चाहे जमीन शिक्षा विभाग की हो, गृह मंत्रालय की हो या रक्षा मंत्रालय की ही क्यों ना हो !
इस खुले मैदान का ऐतिहासिक महत्व इसी बात से साबित होता है कि पूर्व मुख्यमंत्री स्व. सुंदरलाल पटवा ने भी इसी मैदान में एक बड़ी जनसभा के दौरान इसे 'खेल मैदान' के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी।
*विधायक जी और सांसद जी से सीधे सवाल*
उल्टा सवाल तो शहर के विधायक जी और सांसद जी से पूछा जाना चाहिए कि, जब अशोक मोदी (मोदी टेलर) और उनके साथियों की अगुवाई में अंबेडकर रोड स्थित इस क्रमांक-2 मैदान से लगी दुकानों के मालिकों ने अपनी दुकानें बड़ी करने के लिए इस मैदान पर गिद्ध दृष्टि डाली थी और पीछे कुछ जमीन खरीदने की सामूहिक पेशकश की थी, तब उनकी अनुशंसा पर हस्ताक्षर किसने किए थे? कौन तैयार हो गया था इस मैदान की जमीन बेचने को ? तब किसी को इस बात का ख्याल क्यों नहीं आया कि यह स्कूल की जमीन है और इसे बचाना चाहिए? लेकिन सच तो यही है की तब भी इस प्रस्ताव की हवा निकाल कर इस मैदान को बचाने वाले यही मैदान प्रेमी थे...
*भाजपा कांग्रेस सभी ने की बंदरबाट*
विद्यालय यहां बने या न बने, मैदान बचे या न बचे, लेकिन इस आंदोलन ने शहर के भूमाफियाओं और उनके आकाओं को रडार पर ला खड़ा किया है, यह भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।
एक-एक करके बीते दशकों में शहरवासियों के हिस्से के 'कॉमन स्पेस' (खुले क्षेत्रों) को डकार जाने वाले भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़े जनप्रतिनिधियों को जनता ने चेता दिया है कि आपकी अब तक की बंदरबांट और अकर्मण्यता पर खामोशी नहीं साधी जाएगी। शहर की क्या दुर्गति बना दी है कि एक अदद स्कूल बनाने के लिए 4 वर्षों में 25 बीघा जमीन नहीं जुटा पाए, और बातें करते हैं 'झकास विकास' की!
(और भी कई कुतर्क बाकी हैं, जिनके जवाब अगली कड़ी में…)