सिंगोली । पूर्व में ऋषि मुनियों ने जो संस्कार दिए हैं उन्ही का अनुसरण कर शिक्षक देश के युवाओं को संस्कारवान बना रहे हैं जीवन में नेतृत्व क्षमता बढ़ाने के लिए एक शिक्षक का दायित्व महत्वपूर्ण रहता है जिस प्रकार से शिक्षक बच्चों को शिक्षा देते हैं उसी का अनुसरण होता है उपरोक्त बातें भादवामाता में शिक्षक दिवस के अवसर पर मानव अधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग और भारतीय मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट जिला नीमच के संयुक्त तत्वाधान में दोनों संस्थाओं के अध्यक्षों ओमप्रकाश जी पुरोहित सांडिया व हरिश जी शर्मा सिंगोली द्वारा आयोजित सेवानिवृत व सेवारत 70 शिक्षक शिक्षिकाओ के सम्मान का कार्यक्रम गुर्जरगौड़ ब्राह्मण धर्मशाला  में आयोजित किया समारोह के अवसर पर मंदसौर के भाजपा जिला अध्यक्ष राजेश जी दीक्षित ने कहीं। उन्होंने कहा है कि एक शिक्षक ही है जो देश की अर्थव्यवस्था,भूगोल, व इतिहास को भली भांति समझता है । प्रोफेसर संजय जी जोशी ने कहा है* की ऋषि मुनियों को शिल्प कला, वास्तु कला सहित सभी 18 कलाएं ज्ञात थी । सभी को तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए पहला दिमाग में संस्कारवान बातें बिठाना, दूसरा किसी के भी मन को ठेस न पहुंचाना और तीसरा अपने हाथों से जन सेवा करना । इस दौरान आपने धर्मशाला पर ट्रस्टी बनने की घोषणा की  विजयपुर के सरपंच श्यामलाल जी शर्मा ने कहा है कि सिर्फ शिक्षक ही है हम सभी को भी अपने-अपने विवेक आने वाली पीढ़ियों को ज्ञानवान बनाना है । ये सिर्फ़ समाज ही नहीं अपितु पूरे देश के लिए हितकारी होता है। शिक्षक अंबिकाप्रसाद जी जोशी ने कहा हैं की छात्र को सही दिशा देने का कार्य सिर्फ़ एक शिक्षक ही कर सकता हैं  आज शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा का स्तर इतना ऊपर हो गया है की जिले में 55% से अधिक बच्चें  ए प्लस में उत्तीर्ण हो रहे है । पंडित गोविंद जी उपाध्याय ने कहा है की जो श्रद्धावान होता है वही सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है ।प्रहलाद जी पुरोहित ने डॉ राधाकृष्णन सर्वपल्ली जी के जीवन पर प्रकाश डाला । श्रीमति कुसुम जी शर्मा ने भी शिक्षको के द्वारा दिए जाने वाले संस्कारों को अपने जीवन में उतारने पर बल दिया।
धर्मशाला अध्यक्ष बद्रीलाल जी पुरोहित ने कहा है कि एक शिक्षक ही है जो अपने सपनों को परे रखकर अपने छात्रों के भविष्य को सवारने की पहली सीढ़ी बनता है । इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन व अन्य उपस्थित थे । कार्यक्रम का संचालन गोपाल जी पंचारिया ने किया व आभार घनश्याम जी पुरोहित ने माना ।