मनासा। महानगरों को स्मार्ट बनाने और ग्रामीण अंचलों में विकास की गंगा बहाने के दावों के बीच मध्य प्रदेश के नीमच जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है।
यह तस्वीर किसी पिछड़े राज्य के सुदूर इलाके की नहीं, बल्कि मनासा तहसील के ग्राम खजूरी (खजूरी जोरावर सिंह) की है। यहाँ बुनियादी सुविधाओं की बदहाली का आलम यह है कि एक 80 वर्षीय बुजुर्ग के निधन के बाद, शोकाकुल परिजनों और ग्रामीणों को भारी बारिश के बीच अपने हाथों में तिरपाल तानकर अंतिम संस्कार की रस्मों को पूरा करना पड़ा। सोशल मीडिया पर इस लाचारी का वीडियो वायरल होने के बाद, शासन-प्रशासन के विकास के दावों की कलई पूरी तरह खुल गई है।
अंतिम सफर में भी कांटों भरा रास्ता, श्मशान पहुंचते ही आसमान से बरसी आफत,प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम खजूरी के सम्मानित बुजुर्ग राधाकिशन पाटीदार का निधन हो गया था। नम आंखों से परिजन और ग्रामीण जब उनकी अंतिम यात्रा लेकर गांव के मुक्तिधाम की ओर बढ़े, तो मुसीबतों का सिलसिला वहीं से शुरू हो गया। मुक्तिधाम तक पहुंचने का पहुंच मार्ग पूरी तरह कीचड़ और मलबे से सराबोर था, जिससे शवयात्रा को वहां तक ले जाने में ग्रामीणों को भारी मशक्कत करनी पड़ी। जैसे-तैसे जब शव को श्मशान घाट पहुंचाया गया, तो अचानक तेज मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। जब तक जलती रही चिता, तब तक सिस्टम की नाकामी को ढकता रहा तिरपालगांव के इस शवदाह गृह (मुक्तिधाम) में न तो कोई पक्का शेड था और न ही बुनियादी सुविधाएं। बारिश के पानी से चिता की लकड़ियों और शव के भीगने का खतरा पैदा हो गया, जिससे अंतिम संस्कार रुकने की नौबत आ गई। ऐसे संवेदनशील और दुखद क्षणों में ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए एक बड़ी तिरपाल की व्यवस्था की। इसके बाद जो दृश्य दिखा, वह व्यवस्था पर सबसे बड़ा तमाचा था। अंतिम संस्कार संपन्न होने तक, तेज बारिश के बीच परिजन और ग्रामीण चारों तरफ से अपने हाथों में तिरपाल थामकर खड़े रहे। एक तरफ परिजन अपनों को खोने के गम में डूबे थे, तो दूसरी तरफ वे अपनी सुध-बुध खोकर इस नाकाम सिस्टम की लाचारी तले चिता की आग को बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे।
आखिर कब तक कागजों में चमचमाती रहेंगी योजनाएं?,इस दर्दनाक वाकये को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में ग्राम पंचायत से लेकर जिला प्रशासन के प्रति भारी आक्रोश व्याप्त है। आक्रोशित ग्रामीणों का कहना है कि एक आम नागरिक जीते-जी तो राशन, पानी, सड़क और अपने मौलिक हकों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है और अंतहीन कतारों में दम तोड़ देता है। लेकिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और संवेदनहीन बात है कि मौत के बाद सम्मानजनक अंतिम विदाई के लिए भी उसे एक अदद टीन शेड तक नसीब नहीं हो पा रहा है।
सूबे में 'मुख्यमंत्री मुक्तिधाम योजना' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के तहत हर गांव में सर्वसुविधायुक्त श्मशान घाट बनाने का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन खजूरी गांव की यह मर्मस्पर्शी तस्वीर गवाही दे रही है कि करोड़ों का बजट धरातल पर उतरने से पहले ही फाइलों में दफन हो जाता है।
ग्रामीणों की दो टूक: जब तक लिखित आश्वासन नहीं, तब तक आक्रोश शांत नहीं
सोशल मीडिया पर इस हृदयविदारक घटना का वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। सजग नागरिकों और खजूरी के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से दो टूक मांग की है कि गांव के मुक्तिधाम में तत्काल प्रभाव से पक्के टीन शेड का निर्माण कराया जाए और श्मशान के पहुंच मार्ग को दुरुस्त किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे अब खोखले वादों से थक चुके हैं और जब तक धरातल पर काम शुरू नहीं होता, उनका विरोध जारी रहेगा, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को अपनी विदाई के क्षणों में ऐसी अमानवीय और असहनीय वेदना न झेलनी पड़े