नीमच। विश्व बांस दिवस (18 सितंबर) के अवसर पर नीमच जिले के ग्राम भाटखेड़ी निवासी प्रगतिशील किसान कमलाशंकर विश्वकर्मा की बांस आधारित खेती और जैव विविधता संरक्षण की पहल चर्चा में है। क्षेत्र में स्नेहपूर्वक ‘बैम्बू मैन’ के नाम से पहचाने जाने वाले कमलाशंकर ने खेती को केवल उत्पादन और आय का साधन न मानकर इसे पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, प्रशिक्षण, रोजगार और पर्यावरण पर्यटन से जोड़ते हुए एक अभिनव मॉडल के रूप में विकसित किया है। माइक्रोबायोलॉजी में स्नातक तथा समाज कार्य एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त कमलाशंकर ने कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़े विभिन्न प्रशिक्षणों के माध्यम से अपने ज्ञान का विस्तार किया। खेती में पूर्णकालिक रूप से आने से पहले वे दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्य कर चुके हैं। कोरोना काल में उन्होंने नौकरी छोड़कर गांव लौटने और कृषि के क्षेत्र में एक नया प्रयोग शुरू करने का निर्णय लिया।
एक हेक्टेयर से शुरू हुआ नवाचार
गांव लौटने के बाद उन्होंने भाटखेड़ी में लगभग एक हेक्टेयर भूमि पर बांस की उन्नत खेती शुरू की। समय के साथ यही भूमि ‘विश्वकर्मा बैम्बू फार्म एंड बायोडायवर्सिटी पार्क’ और ‘फूड फॉरेस्ट नीमच’ के रूप में विकसित हुई।
बांस के साथ अश्वगंधा, शतावरी सहित विभिन्न औषधीय पौधों और बहुवर्षीय वृक्षों को शामिल कर उन्होंने बहुस्तरीय खेती का मॉडल तैयार किया। उनके अनुसार फार्म पर करीब 30 से 40 प्रकार की औषधीय प्रजातियों का संरक्षण एवं प्रदर्शन किया जाता है। वहीं लगभग 25 से 30 प्रजातियों के पक्षी और 10 से 12 प्रजातियों की बड़ी तितलियां भी यहां देखी जाती हैं। इस तरह यह फार्म मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु-सहनशील कृषि का उदाहरण बनकर उभरा है।
बांस को बनाया रोजगार और उद्यमिता का माध्यम
कमलाशंकर ने बांस को खेती के साथ उद्यमिता से भी जोड़ा है। पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में उन्होंने बांस के इको-फ्रेंडली टूथब्रश तैयार किए। इसके अलावा जैविक अनाज, दालें, मसाले और जड़ी-बूटियों के मूल्य संवर्धन एवं बिक्री के लिए ‘विश्वकर्मा ऑर्गेनिक्स’ के माध्यम से कार्य किया जा रहा है।
उनका फार्म अब पर्यावरण पर्यटन, पिकनिक, फोटोग्राफी और प्री-वेडिंग शूट के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से वे बांस की खेती, जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ कृषि के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
किसानों और युवाओं के लिए बना ‘लर्निंग साइट’
कमलाशंकर ने अपने फार्म को केवल खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘लर्निंग साइट’ के रूप में भी विकसित किया है। किसान, विद्यार्थी, शोधार्थी और विभिन्न संस्थाओं से जुड़े लोग यहां पहुंचकर खेती के व्यावहारिक मॉडल को समझते हैं।
वे किसानों, विद्यार्थियों और युवाओं के लिए प्रशिक्षण, फील्ड विजिट और परामर्श कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं। उनके प्रयासों से लगभग 15 से 20 लोगों को रोजगार मिलने की जानकारी है। इसके साथ ही वे आनंद विभाग में राज्य स्तर पर मास्टर ट्रेनर के रूप में वॉलंटियर सेवाएं भी दे रहे हैं।
नवाचार के लिए मिले कई सम्मान
बांस आधारित कृषि-वनीकरण, पर्यावरण पर्यटन और पुनर्योजी कृषि के क्षेत्र में उनके कार्यों को विभिन्न मंचों पर सम्मान मिल चुका है। उन्हें वर्ष 2020-21 में आत्मा परियोजना के अंतर्गत जिला स्तरीय सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार, वर्ष 2024 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर का ‘कृषक फैलो सम्मान’, वर्ष 2025 में ‘प्रो. रतनलाल अवॉर्ड्स फॉर एक्सीलेंस इन रिजनरेटिव एग्रीकल्चर’ में राष्ट्रीय सम्मान तथा वर्ष 2026 में आर्ट ऑफ लिविंग का ‘अनसंग एवरीडे हीरोज अवॉर्ड’ प्रदान किए जाने की जानकारी है।
“बांस सिर्फ फसल नहीं, भविष्य का संसाधन”
कमलाशंकर विश्वकर्मा का मानना है कि बांस केवल एक फसल नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण संसाधन है। उनका प्रयास ऐसी कृषि पद्धति विकसित करना है, जिसमें किसान की आय बढ़ने के साथ मिट्टी, पानी, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहे।
विश्व बांस दिवस पर कमलाशंकर विश्वकर्मा की पहल यह संदेश देती है कि प्रकृति के साथ संतुलन, नवाचार और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग से एक खेत को भी पर्यावरण संरक्षण, प्रशिक्षण और ग्रामीण विकास की बड़ी प्रयोगशाला बनाया जा सकता है।
कमलाशंकर विश्वकर्मा ‘बैम्बू मैन’
विश्वकर्मा बैम्बू फार्म एंड बायोडायवर्सिटी पार्क, भाटखेड़ी, मनासा, नीमच (म.प्र.)
मो.: 7838960968