नीमच। ( मनोज मीणा)। व्हीलचेयर पर आए पैर... और चंद दिनों बाद माँ के जयकारे लगाते हुए अपने कदमों पर लौटते भक्त! यह कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि मालवांचल की पावन धरा पर विराजने वाली माँ भादवा माता के दरबार की वो हकीकत है, जिसे रोज़ हज़ारों आँखें साक्षात देखती हैं। 'मालवा की वैष्णो देवी' के रूप में विख्यात माँ भादवा माता का यह पावन धाम आज देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अटूट विश्वास, असीम श्रद्धा और चमत्कारों का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से फैलाई गई झोली कभी खाली नहीं रहती।विज्ञान जहाँ मौन,वहाँ काम करती है मैया की कृपा भादवामाता का यह ऐतिहासिक मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए एक नई जिंदगी की उम्मीद है जो चिकित्सा विज्ञान से थक हार चुके हैं। यहाँ दूर-दूर से ऐसे मरीज पहुँचते हैं जो लकवा (पैरालिसिस),पोलिया या अन्य गंभीर न्यूरोलॉजिकल और असाध्य शारीरिक असमर्थता से पीड़ित होते हैं। माता के दरबार की भस्म,अखंड ज्योति का तेल और परिसर में स्थित पवित्र बावड़ी का जादुई जल (स्नान व आचमन) भक्तों के लिए किसी दिव्य औषधि की तरह काम करता है। कई असाध्य रोगी यहाँ से पूरी तरह स्वस्थ होकर मुस्कुराते हुए अपने घर लौटे हैं।
रविवार को बरसती है विशेष कृपा: पैर रखने की जगह नहीं,यूँ तो सप्ताह के सातों दिन मैया का यह दरबार भक्तों की सेवा और दर्शन के लिए खुला रहता है, लेकिन रविवार के दिन का नजारा बिल्कुल अलग होता है। श्रद्धालुओं की गहरी मान्यता है कि रविवार को माता रानी अपने बच्चों पर विशेष रूप से मेहरबान रहती हैं और इसी दिन चमत्कारों का ग्राफ सबसे ज्यादा होता है। रविवार के इस पावन अवसर पर भी सुबह की मंगला आरती से ही मंदिर परिसर में भक्तों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि तिल रखने की जगह नहीं बची। पूरा अंचल 'जय माता दी' और 'भादवा माता की जय' के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान रहा।आकर्षण के मुख्य बिंदु: जो इस दरबार को बनाते हैं खास
चमत्कारिक बावड़ी,मान्यता है कि इस पवित्र जल में औषधीय और दैवीय गुण हैं, जो चर्म रोग और लकवा को जड़ से खत्म करते हैं।
अटूट अखंड ज्योति, गर्भगृह में सदियों से प्रज्वलित दिव्य ज्योति, जिसके दर्शन मात्र से मानसिक शांति मिलती है।
जीवित जीवों को अभयदान,मन्नत पूरी होने पर भक्तों द्वारा मुर्गे या बकरियां छोड़ने की अनोखी परंपरा, जो जीव दया का संदेश देती है।