नीमच। ग्राम पंचायतों में महिला सरपंचों के अधिकारों और उनकी भूमिका को लेकर एडवोकेट प्रकाश रांका ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जनता जिस व्यक्ति को सरपंच चुनती है,पंचायत के कार्यों, विकास योजनाओं और प्रशासनिक मामलों में संवाद भी उसी निर्वाचित प्रतिनिधि से होना चाहिए। सरपंच पति या परिवार के सदस्य सहयोग कर सकते हैं, लेकिन पंचायत की जिम्मेदारी और जवाबदेही निर्वाचित सरपंच की ही है। एड. रांका ने कहा कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कई जगह ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां महिला सरपंच निर्वाचित होने के बावजूद पंचायत के कार्यों और निर्णयों में उनके पति या अन्य परिजन सक्रिय भूमिका निभाते हैं। ऐसी स्थिति में महिला आरक्षण के वास्तविक उद्देश्य पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली और महत्वपूर्ण इकाई है। ग्रामीणों को भी जागरूक होकर पंचायत से जुड़ी जानकारी, शिकायत और विकास कार्यों के लिए सीधे सरपंच से संवाद करना चाहिए। पंचायत के निर्णयों और योजनाओं की जानकारी स्वयं लेनी चाहिए, ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकें।
महिला नेतृत्व को मिले वास्तविक अधिकार
रांका ने शासन से मांग की कि महिला सरपंचों को उनके संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही पंचायतों में पारदर्शिता बढ़ाने और निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक भूमिका सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देना है, न कि केवल उनके नाम पर पद सीमित रखना। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देना है, न कि केवल उनके नाम पर पद सीमित रखना। एड. प्रकाश रांका ने सवाल उठाया कि जब महिला सरपंच जनता के मतों से निर्वाचित होती हैं, तो पंचायत के कामकाज में उनकी सीधी भागीदारी क्यों सुनिश्चित नहीं की जाती? उन्होंने कहा कि पंचायतों में महिला नेतृत्व को वास्तविक अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए।
— एड. प्रकाश रांका, पूर्व जिला , उपाध्यक्ष, कांग्रेस पार्टी, नीमच-जावद विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 230