(कपिल सिंह चौहान)

नीमच में इन दिनों दो निर्माण कार्य समानांतर चल रहे हैं, लेकिन दोनों को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की संवेदनशीलता में ज़मीन-आसमान जितना फ़र्क़ दिख रहा है, कि अब गली-मोहल्लों और चौराहों पर लोग खुलकर सवाल पूछने लगे हैं। सवाल यह की फोरलेन सड़क का निरीक्षण से इतना संकोच क्यों है विधायकों और सांसद को ?      

नीमच में ₹106.53 करोड़ की लागत से 16 किलोमीटर लंबा 'सिटी फोरलेन' (भाटखेड़ा-नीमच-डूंगलावदा सड़क) बनाई जा रही है। यह वही सड़क है जिसे नीमच की जावद, मनासा सहित तीनों विधानसभाओं की 8 लाख जनता की सुविधा के लिए बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ जिला मुख्यालय पर भारतीय जनता पार्टी का लगभग 20,000 स्क्वायर फीट का एक नया जिला कार्यालय भी बनाया जा रहा है, जिस पर करीब ₹2 से ₹2.5 करोड़ का ख़र्च आने का अनुमान है।सवाल यह नहीं है कि एक राजनीतिक दल अपने भावी कार्यालय का निरीक्षण क्यों कर रहा है। यक्ष प्रश्न यह है कि जिस 'ट्रिपल इंजन' सरकार में सांसद, विधायक और नपाध्यक्ष के प्रतिनिधियों को अपने 'संगठनात्मक घर' के निर्माण की रत्ती-रत्ती गुणवत्ता की इतनी चिंता है, उन्ही नेताओं को जनता के टैक्स से बन रही  'सार्वजनिक फोरलेन' की चिंता क्यों नहीं है ? 

एक तरफ निरीक्षण की झड़ी, दूसरी तरफ 'सब भगवान भरोसे'!
सरकारी कागज़ों और नेताओं की सोशल मीडिया पोस्ट पर नज़र डालें तो पता चलता है कि 6 अप्रैल को भूमिपूजन होने से लेकर आज 5 अक्टूबर तक, भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने नीमच में अपने निर्माणाधीन पार्टी दफ़्तर का 15 से भी ज़्यादा बार 'ऑन-स्पॉट' निरीक्षण किया है।

निर्माणाधीन भाजपा कार्यालय का निरीक्षण-
3 अप्रैल: भूमिपूजन से पहले ही विधायक दिलीप सिंह परिहार और नपाध्यक्ष स्वाति चोपड़ा जायज़ा लेने पहुँचे। 
9 अप्रैल: विधायक परिहार के साथ मनासा विधायक माधव मारू भी दफ़्तर का मुआयना करने पहुँचे।
11 मई: प्रभारी मंत्री निर्मला भूरिया, सांसद सुधीर गुप्ता और दोनों विधायक पूरे लवाज़मे के साथ पहुँचे।
11 जून, 19 जून और 23 जून: नपाध्यक्ष प्रतिनिधि गौरव चोपड़ा और मनासा विधायक अनिरुद्ध मारू सहित अन्य नेताओं ने निरिक्षण किया ।
1 जुलाई, 27 जुलाई, 26 अगस्त, 13 सितंबर: विधायक परिहार और नपाध्यक्ष स्वाति चोपड़ा बार-बार काम देखने जाते रहे।
27 सितंबर: जिला प्रभारी सुभाष पटेल पहुँचे।
5 अक्टूबर (आज): विधायक दिलीप सिंह परिहार ने एक बार फिर मौक़े पर जाकर काम देखा।
विधायक जी तो अपनी पोस्ट में यहाँ तक लिखते हैं कि, "प्राणों से प्रिय भाजपा का निर्माणाधीन कार्यालय!"

अब दूसरी तस्वीर देखिए, 16 किलोमीटर लंबे 106 करोड़ के सिटी फोरलेन की! यहाँ नेताओं का यह 'निरीक्षण प्रेम' पूरी तरह ग़ायब हो जाता है । 10 दिसंबर 2025 को कलेक्टर हिमांशु चंद्रा ने सड़क पर उतरकर ठेकेदार को डामर-सीमेंट की क्वालिटी, लैब टेस्टिंग, ड्रेनेज और सड़क की मोटाई सही रखने के सख्त निर्देश दिए थे। एकाध बार नीमच एसडीएम भी पहुंचे और 1-2 बार नीमच विधायक दिलीप सिंह परिहार भी इस नई सड़क पर पहुंचे, लेकिन प्रशासन के अधिकारी और विधायक नपाध्यक्ष आदी ने शहर की लाईफ लाइन और कई गुना ज्यादा लागत से बनने वाली फोरलेन सड़क का निरीक्षण उतनी बार नहीं किया जितना निरीक्षण निर्माणाधीन भाजपा कार्यालय का हो रहा है। क्या जनता के पैसे से, जनता के लिए बन रही इतनी बड़ी सड़क को सिर्फ़ ठेकेदारों के भरोसे छोड़ देना सही है?

यह भी तब जब निर्माणाधीन फोरलेन पर कई बार शिकायते आई, दुर्घटनाए हुई और अभी काम जारी है.. निर्माणाधीन फोरलेन पर रेडियम-रिफ्लेक्टर, ख़तरे के बोर्ड और सुरक्षा के लिए सही बैरिकेडिंग की मांग कई बार उठी । कई घटनाओ में मृत परिजनो ने इस निर्माणाधीन सड़क पर हुई दुर्घटनाओं का कारण निर्माण में लापरवाही बताया है। 

कनावटी में हादसा: रात के अंधेरे में सड़क पर कोई साइन बोर्ड या रिफ़्लेक्टर न होने के आरोप लगे, 22 साल के युवा परसराम की बाइक दुर्घटनाग्रस्त हो गई और उनकी जान चली गई।
डूंगलावदा में हादसा: आरोप लगे की सड़क की अनियोजित खुदाई और किनारे पड़े मिट्टी के ढेरों की वजह से 35 साल का कृष्णा ग्वाला ट्रॉले के नीचे आ गया और मौक़े पर ही ख़त्म हो गया।
नीमच में हादसा: सितंबर में बाइक दुर्घटना में 30 साल के गोविंद बागरी की मौत हो गई। आरोप लगे की सुरक्षा इंतज़ामों की कमी थी।  
ग्वालटोली में हादसा (4 अक्टूबर): सुरक्षा घेरा न होने के आरोप लगे जिससे दो बाइकों की सीधी भिड़ंत हुई और 40 साल के कारूलाल भील की जान चली गई।

*सड़क की गुणवत्ता पर भी ऊठे सवाल*
दर्दनाक हादसों के अलावा, आए दिन नीमच फोरलेन के निर्माण में घटिया सामग्री के इस्तेमाल, ड्रेनेज के अभाव, अलाइनमेंट में हेरफेर और निरंकुश निर्माण के गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोप यहाँ तक हैं कि क्षेत्र के प्रभावशील व रसूखदार लोगों के अतिक्रमणों को बचाने के लिए प्लान के नक्शे के विपरीत रोड को कई जगह संकरा और छोटा किया जा रहा है। 

*जनता के काम में लापरवाही स्वीकार्य है ?*
जब एक आम आदमी मात्र 600 स्क्वायर फीट का अपना छोटा सा मकान बनाता है, तो उसमें भी कई तरह के इशू कलहड़े होते हैं। वह भी सीमेंट, सरिया और कंक्रीट की मोटाई दिन में दस बार जाकर चेक करता है। नीमच भाजपा के नेता और जनप्रतिनिधीयों का अपनी पार्टी के 20 हज़ार वर्ग फीट के दफ़्तर से ऐसा लगाव तो समझ आता है... लेकिन जब बात जनता की गाढ़ी कमाई के 106 करोड़ रुपये की आती है, तो उनकी यह जागरूकता कहाँ सो जाती है?

पार्टी कार्यालय में काम सही न होने की इतनी आशंका है या कि नेताओं और मंत्रियों को अपने आकाओं के डर से 15-15 बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, तो 16 किलोमीटर लंबे 'सिटी फोरलेन' को ठेकेदार की मर्ज़ी और प्रशासनिक एजेंसियों के भरोसे पर लावारिस क्यों छोड़ दिया जा रहा है ?

क्या लगातार वोट देकर 'ट्रिपल इंजन' की सरकार बनाने वाली नीमच की जनता के लिए यह सड़क सिर्फ़ चुनाव में फीता काटने और वाहवाही लूटने का ज़रिया है?
क्या जनप्रतिनिधियों का काम सिर्फ़ शिलान्यास और उद्घाटन के पत्थर लगवाना है? क्या जनता के पैसों से बन रही सड़क की क्वालिटी चेक करना और यात्रियों की जान बचाना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है?

*चलते-चलते...*
नेताओं को यह समझना होगा कि पार्टी का दफ़्तर उनका निजी या संगठनात्मक घर हो सकता है, लेकिन 'सिटी फोरलेन' पूरे नीमच शहर की ह्रदयरेखा है। अगर अपने दफ़्तर जैसी ही सख्ती और सतर्कता जनता के कामों में नहीं दिखाई गई, तो आधी-अधूरी सड़कों पर बहता बेकसूरों का खून और घटिया निर्माण आने वाले समय में जनता की अदालत में भारी पड़ेगा!