*✍(राकेश मालवीय, मालवा)*

इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने प्रशासन की नींद उड़ाई तो उसकी धमक नीमच तक भी पहुंची। नगर पालिका अचानक जागी और दो निजी वाटर प्लांट सील कर दिए। कागजों पर यह कार्रवाई जनहित और सख्ती नजर आती है, लेकिन अगर सिक्के का दूसरा पहलू देखें तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह सचमुच सेहत की चिंता है या फिर अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने का एक सुनियोजित प्रयास?
नगर पालिका की सीएमओ दुर्गा बामनिया की सख्ती की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। दावा है कि नागरिकों को शुद्ध पानी पिलाना उनकी प्राथमिकता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस नगर पालिका को पूरे शहर की प्यास बुझाने का जिम्मा मिला है, उसके अपने दफ्तर में हर दिन पीने के पानी के 20 से ज्यादा कैंपर उतारे जाते हैं। यानी जिस विभाग के पास अपना वॉटर फिल्टरेशन प्लांट है, अपनी लैब है और केमिस्ट की फौज है, उसे खुद के सप्लाई किए गए पानी पर भरोसा नहीं है। जब साहब और बाबू खुद का गला तर करने के लिए निजी सप्लायर्स के कैंपर पर निर्भर हैं, तो वे शहरवासियों को शुद्ध पेयजल की गारंटी किस मुंह से दे रहे हैं?
यह तो वही बात हो गई- उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। खुद का सिस्टम फेल है और ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ा जा रहा है। निजी प्लांट पर कार्रवाई जरूर होनी चाहिए, अगर वे जहर परोस रहे हैं तो उन्हें बंद करना ही सही है, लेकिन सवाल नीयत का है। क्या यह कार्रवाई केवल इंदौर कांड के डर से उपजी एक रस्म अदायगी है? या फिर ध्यान भटकाने की कोई बड़ी रणनीति?
नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर संदेह इसलिए भी गहराता है क्योंकि उसकी नाक के नीचे नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिस नगर पालिका कार्यालय से महज 30 फिट की दूरी पर ग्रीन नेट की आड़ में एक अवैध बिल्डिंग का निर्माण सीना तानकर खड़ा हो रहा है, वहां प्रशासन की सख्ती का चश्मा धुंधला क्यों हो जाता है? क्या अफसरों को वह अवैध निर्माण नजर नहीं आता या फिर मौन रहने की कीमत चुकाई जा चुकी है?
अवैध निर्माण के लिए उत्तरदायी अफसर जब वॉटर प्लांट सील करने निकलते हैं, तो यह कहावत सटीक बैठती है- चोर की दाढ़ी में तिनका। एक तरफ शहर की व्यवस्था को चूना लगाने वाले निर्माणों को मूक सहमति देना और दूसरी तरफ कुछ कैंपर जब्त कर खुद को रक्षक साबित करना, इस दोहरे मापदंड से नीमच शहर की जनता भली-भांति परिचित है।
शहर की जनता पूछ रही है कि अगर कल को नगर पालिका द्वारा सप्लाई किए गए नलों के पानी का सैंपल फेल हो गया, तो क्या सीएमओ साहब खुद के विभाग को भी वैसे ही सील करेंगी? शुद्ध पानी पिलाना केवल निजी सप्लायर्स की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह नगर पालिका का संवैधानिक कर्तव्य है।
अतः, यह सख्ती तभी सार्थक मानी जाएगी जब नगर पालिका पहले खुद के सिस्टम को पारदर्शी बनाए। सरकारी दफ्तरों से निजी कैंपरों की विदाई हो और शहर के हर कोने में लगे अवैध निर्माणों पर बिना नोटिस, बिना विचारे कार्रवाई हो वरना, यह केवल सुर्खियां बटोरने का एक स्टंट बनकर रह जाएगा और जनता यूं ही अशुद्ध पानी और दूषित व्यवस्था की मार झेलती रहेगी!