राजस्थान में राजनीतिक जंग:गहलोत ने वसुंधरा की प्रशंसा इसलिए की ताकि कांग्रेस के लिए चुनावी जंग आसान हो जाए

राजस्थान। राजस्थान में चुनाव के पहले राजनीतिक बहस और बयान अपने चरम पर हैं। अशोक गहलोत राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। दो दिन पहले उन्होंने कांग्रेस में बग़ावत करने वाले विधायकों, पदाधिकारियों पर व्यंग्य बाण छोड़े तो यह एक साधारण प्रतिक्रिया मानी गई क्योंकि गहलोत और पायलट के बीच यह सब महीनों, वर्षों से चल रहा है। गहलोत ने बड़ी चतुराई से भाजपा नेता वसुंधरा राजे की प्रशंसा भी की। उनकी प्रशंसा में बड़ा भावुक बयान भी दिया।

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9 घंटे पहले

गहलोत ने वसुंधरा की प्रशंसा इसलिए की ताकि कांग्रेस के लिए चुनावी जंग आसान हो जाए|देश,National – Dainik Bhaskar
राजस्थान में चुनाव के पहले राजनीतिक बहस और बयान अपने चरम पर हैं। अशोक गहलोत राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। दो दिन पहले उन्होंने कांग्रेस में बग़ावत करने वाले विधायकों, पदाधिकारियों पर व्यंग्य बाण छोड़े तो यह एक साधारण प्रतिक्रिया मानी गई क्योंकि गहलोत और पायलट के बीच यह सब महीनों, वर्षों से चल रहा है। गहलोत ने बड़ी चतुराई से भाजपा नेता वसुंधरा राजे की प्रशंसा भी की। उनकी प्रशंसा में बड़ा भावुक बयान भी दिया।

गहलोत ने रविवार को धौलपुर के राजाखेड़ा में सभा की। यहीं राजे की जमकर तारीफ की। – Dainik Bhaskar
गहलोत ने रविवार को धौलपुर के राजाखेड़ा में सभा की। यहीं राजे की जमकर तारीफ की।
दरअसल, गहलोत एक तीर से कई निशाने साधना चाहते हैं। उनकी राजनीति की यही पहचान भी है। वसुंधरा राजे की प्रशंसा के पीछे उनके कई मंतव्य हैं। जैसी कि अफ़वाह है कि गहलोत और वसुंधरा राजे एक- दूसरे का साथ दे रहे हैं। खुद अशोक गहलोत भी जानते हैं कि इस अफ़वाह में थोड़ी-सी भी सच्चाई नहीं है। फिर भी वसुंधरा राजे की प्रशंसा करके वे इस अफ़वाह को सच साबित करना चाहते हैं। इसमें उनका अपना फ़ायदा है। यानी गहलोत का।

गहलोत अच्छी तरह जानते हैं कि यह अफ़वाह सही साबित हो जाती है तो भाजपा आलाकमान कभी भी वसुंधरा राजे पर भरोसा नहीं करेगा और उन्हें चुनाव की कमान नहीं सौंपेगा। दरअसल, चुनाव से वसुंधरा राजे के नेतृत्व की अनुपस्थिति ही कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। और दूसरा कोई कारण नहीं है क्योंकि वसुंधरा राजे को छोड़ बाक़ी कई भाजपा नेताओं को पटखनी देने के तो कई सूत्र गहलोत की मुट्ठी में हैं। यह बात बाक़ी भाजपा नेता और खुद गहलोत भी अच्छी तरह जानते हैं।

जहां तक वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत का सवाल है, इनकी पार्टीगत दुश्मनी पूरा राजस्थान वर्षों से देखता आ रहा है। दोनों एक- दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते। बात बयानों की हो या एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप की, इन दोनों के बीच जितना तीखा संग्राम हुआ है, दूसरे राजनेताओें के बीच कम ही हुआ होगा। बहरहाल राजनीति तो राजनीति है।

गहलोत के वार का जवाब वसुंधरा राजे ने भी दिया। उन्होंने कहा- जितना नुक़सान मेरा और भाजपा का गहलोत ने किया है और कोई कर ही नहीं सकता। इतना ही नहीं, वसुंधरा ने पलटवार में कहा- कांग्रेस के विधायकों द्वारा पैसा लेने के बयान गहलोत आए दिन देते रहते हैं, लेकिन बात केवल बयानों तक ही सीमित रहती है।

अगर गहलोत में हिम्मत है तो रिश्वत लेने वाले विधायकों के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं करवाते? फिर जहां तक विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की बात है, इसमें सबसे ज़्यादा माहिर तो खुद अशोक गहलोत हैं। साल 2008 और 2018 में आख़िर अल्पमत में आने के बाद उन्होंने क्या किया था?

बहरहाल, राजस्थान में बयानों की बाज़ीगरी चल रही है। यह बाज़ीगरी किसके पक्ष में वोट के रूप में परिवर्तित हो पाएगी, यह भविष्य ही बताएगा।