मध्य प्रदेश की राजनीति में मंदसौर जिले की मल्हारगढ़ विधानसभा लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश देवड़ा यहां से लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करते रहे हैं। लेकिन इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक चर्चा भाजपा की ताकत की नहीं, बल्कि कांग्रेस की कमजोरी की हो रही है। कांग्रेस यहां चुनाव भाजपा से कम और आपसी गुटबाजी से ज्यादा हारती दिखाई दे रही है।
मल्हारगढ़ विधानसभा में कांग्रेस के भीतर वर्षों से एक मौन युद्ध चल रहा है। यह लड़ाई विचारधारा की कम और वर्चस्व की ज्यादा नजर आती है। सवाल यह नहीं रह गया कि भाजपा को कैसे हराया जाए, बल्कि यह बन गया है कि “असली कांग्रेसी कौन है?” और “क्षेत्र में कांग्रेस का असली चेहरा कौन होगा?”
कांग्रेस ने पहले श्याम लाल जोकचंद्र पर दांव लगाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक समय ऐसा आया जब वे भाजपा के लिए चुनौती बनते दिखाई दिए और जीत के करीब भी पहुंचे। लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बाद कांग्रेस ने उम्मीदवार बदला और परशुराम सिसोदिया को मैदान में उतारा। उम्मीद थी कि नया चेहरा भाजपा की मजबूत दीवार में सेंध लगाएगा, लेकिन परिणाम उल्टा निकला। भाजपा प्रत्याशी जगदीश देवड़ा ने जीत का अंतर और बढ़ा दिया। पिछले विधानसभा चुनाव में देवड़ा लगभग 60 हजार मतों से विजयी रहे। यह केवल भाजपा की ताकत नहीं, बल्कि कांग्रेस की बिखरी हुई राजनीति का भी परिणाम था।
पराजय के बाद कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और अधिक खुलकर सामने आ गई। परशुराम सिसोदिया ने आरोप लगाया कि श्याम लाल जोकचंद्र के बागी होकर चुनाव लड़ने के कारण उन्हें नुकसान हुआ और इसी वजह से कांग्रेस ने श्याम लाल जोकचंद्र को निष्कासित कर दिया। लेकिन राजनीति में केवल संगठनात्मक कार्रवाई से जनाधार समाप्त नहीं होता। निष्कासन के बाद भी श्याम लाल जोकचंद्र लगातार क्षेत्र में सक्रिय बने रहे और यही बात कांग्रेस के भीतर नए समीकरण पैदा कर रही है।
हाल ही में राज्यसभा चुनाव में पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त हुआ। पूरे जिले में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन मल्हारगढ़ विधानसभा का दृश्य अलग था। यहां कांग्रेस का आधिकारिक आंदोलन उतना प्रभावी दिखाई नहीं दिया, जितनी सक्रियता श्याम लाल जोकचंद्र की दिखाई दी। उन्होंने मीनाक्षी नटराजन के समर्थन में खुलकर आंदोलन किया, आवाज उठाई और सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
यहीं से मल्हारगढ़ कांग्रेस की राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। जब कांग्रेस की पूर्व सांसद और राज्यसभा उम्मीदवार के समर्थन में प्रदेशभर में आंदोलन चल रहा था, तब कांग्रेस के अधिकृत और पराजित उम्मीदवार परशुराम सिसोदिया अपेक्षाकृत शांत क्यों दिखाई दिए? क्या यह उनका राजनीतिक दायित्व नहीं था कि वे इस मुद्दे पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाते? राजनीति में अवसर वही पकड़ता है जो समय पर मैदान में उतरता है और इस बार यह अवसर श्याम लाल जोकचंद्र ने पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया।
आज मल्हारगढ़ में कांग्रेस दो स्पष्ट धड़ों में बंटी दिखाई देती है। एक धड़ा संगठन की वैधानिकता की बात करता है और दूसरा जनसक्रियता की। कांग्रेस का एक वर्ग आज भी श्याम लाल जोकचंद्र को “कांग्रेस का व्यक्ति” मानने को तैयार नहीं है, जबकि जोकचंद्र स्वयं लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि वे कांग्रेस की विचारधारा के साथ खड़े हैं। यही विरोधाभास कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन गया है।
राजनीति केवल टिकट से नहीं चलती, बल्कि संघर्ष, उपस्थिति और जनसंपर्क से चलती है। इस समय मल्हारगढ़ की जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा तेजी से चल रही है कि आंदोलन की राजनीति में श्याम लाल जोकचंद्र परशुराम सिसोदिया से कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक नजर आ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर परशुराम सिसोदिया की चुप्पी सवाल खड़े कर रही है। आखिर वह किस रणनीति के तहत शांत हैं? क्या यह संगठन के भीतर असंतोष है, या राजनीतिक निष्क्रियता?
भाजपा के लिए यह स्थिति बेहद अनुकूल है। जब विपक्ष बंटा हुआ हो, नेतृत्व अस्पष्ट हो और कार्यकर्ता भ्रमित हों, तब सत्ता पक्ष की राह आसान हो जाती है। जगदीश देवड़ा को शायद कांग्रेस से उतनी चुनौती नहीं मिल रही, जितनी कांग्रेस खुद अपने भीतर पैदा कर रही है। यही कारण है कि मल्हारगढ़ में भाजपा लगातार मजबूत और कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है।
यदि कांग्रेस को भविष्य में मल्हारगढ़ विधानसभा में वापसी करनी है तो उसे सबसे पहले यह तय करना होगा कि व्यक्तिगत अहंकार बड़ा है या पार्टी का अस्तित्व। केवल निष्कासन, आरोप और सोशल मीडिया की बयानबाजी से राजनीति नहीं चलती। कांग्रेस को एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और जमीनी संघर्ष की आवश्यकता है। वरना “कौन असली कांग्रेसी” की लड़ाई में पूरा राजनीतिक मैदान भाजपा के हाथों जाता रहेगा। मल्हारगढ़ की राजनीति फिलहाल यही संदेश दे रही है कि कांग्रेस की हार भाजपा की जीत से ज्यादा उसकी अपनी अंदरूनी लड़ाई का परिणाम है।


