( मनोज मीणा मालवा हलचल )

मध्य प्रदेश कांग्रेस इस समय अपने सबसे बड़े राजनीतिक संक्रमण काल से गुजर रही है। राज्यसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद पार्टी के भीतर जो सियासी भूचाल आया, उसने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को पूरी तरह उजागर कर दिया है। गुटबाजी, नेतृत्व संघर्ष, असंतोष और शक्ति प्रदर्शन — इन सबके बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान किसके हाथों में जाएगी? क्या पार्टी एक बार फिर अनुभवी नेतृत्व पर भरोसा करेगी, या फिर नए चेहरे के रूप में मीनाक्षी नटराजन को आगे बढ़ाएगी? प्रदेश कांग्रेस में इस समय कई शक्ति केंद्र सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हैं, जिनकी संगठन पर पकड़ आज भी बेहद मजबूत मानी जाती है, तो दूसरी ओर कमलनाथ गुट भी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने में जुटा हुआ है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का नेतृत्व लगातार सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया से लेकर बंद कमरों तक पार्टी के भीतर उनके खिलाफ असंतोष की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर अब नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा खुलकर होने लगी है। इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह है मीनाक्षी नटराजन। कांग्रेस हाईकमान में उनकी मजबूत पकड़, साफ-सुथरी छवि और वैचारिक राजनीति ने उन्हें अचानक मध्य प्रदेश कांग्रेस के संभावित बड़े चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया है। लेकिन राजनीति केवल हाईकमान की पसंद से नहीं चलती, बल्कि जमीन पर स्वीकार्यता और संगठनात्मक ताकत भी उतनी ही जरूरी होती है। यहीं पर दिग्विजय सिंह का नाम सबसे ज्यादा मजबूती से सामने आता है। दिग्विजय सिंह केवल पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कांग्रेस संगठन की ऐसी धुरी माने जाते हैं जिनकी पकड़ बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं पर रही है। 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने प्रदेश में ऐसा राजनीतिक नेटवर्क खड़ा किया था, जिसका असर आज भी कांग्रेस संगठन में दिखाई देता है। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दिग्विजय सिंह आज भी छोटे से छोटे कार्यकर्ता को पहचानते हैं, उनकी समस्याओं को समझते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। भोपाल में हाल ही में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी और दिग्विजय सिंह के बीच दिखाई दी तनातनी ने यह संकेत भी दे दिया कि कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई अब सतह पर आ चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं थी, बल्कि प्रदेश कांग्रेस के भविष्य के नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान का संकेत था। दूसरी तरफ मीनाक्षी नटराजन को लेकर कांग्रेस में दो तरह की राय दिखाई देती है। एक वर्ग उन्हें कांग्रेस का नया और साफ-सुथरा चेहरा मानता है, जो पार्टी की छवि बदल सकता है। वहीं दूसरा वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या मीनाक्षी नटराजन भाजपा जैसी मजबूत और आक्रामक पार्टी के सामने कांग्रेस को चुनावी लड़ाई में मजबूती से खड़ा कर पाएंगी? क्या उनके पास वह राजनीतिक आक्रामकता, जनसंपर्क और जमीनी नेटवर्क है, जिसकी मध्य प्रदेश की राजनीति में जरूरत पड़ती है? मध्य प्रदेश की राजनीति केवल वैचारिक बहसों से नहीं चलती। यहां चुनाव जीतने के लिए गांव-गांव, बूथ-बूथ तक संगठन की पकड़ और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा जरूरी होती है। भाजपा पिछले दो दशकों में प्रदेश में बेहद मजबूत संगठन खड़ा कर चुकी है। ऐसे में कांग्रेस को केवल एक चेहरा नहीं, बल्कि ऐसा नेतृत्व चाहिए जो संगठन को एकजुट कर सके, कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा कर सके और जनता के बीच यह संदेश दे सके कि कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पूरी तरह तैयार है।मीनाक्षी नटराजन की सबसे बड़ी ताकत उनकी ईमानदार छवि और हाईकमान में विश्वास मानी जाती है। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि क्या प्रदेश कांग्रेस के सभी बड़े नेता उन्हें सहज रूप से स्वीकार करेंगे? क्योंकि कांग्रेस की राजनीति में सार्वजनिक समर्थन और अंदरखाने की राजनीति अक्सर अलग-अलग दिशा में चलती है। मंचों से समर्थन देने वाले कई नेता नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में अपने राजनीतिक समीकरण भी साधते दिखाई दे सकते हैं।वहीं कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि यदि पार्टी को फिर से जमीन पर मजबूत करना है, तो दिग्विजय सिंह जैसे अनुभवी नेता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका अनुभव, संगठनात्मक समझ और कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद आज भी कांग्रेस की बड़ी पूंजी माना जाता है। यही कारण है कि पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग चाहता है कि आने वाले चुनावों में दिग्विजय सिंह की भूमिका निर्णायक हो . दरअसल कांग्रेस की असली लड़ाई भाजपा से पहले खुद अपने भीतर की गुटबाजी से है। जब तक पार्टी एक चेहरा, एक रणनीति और एक दिशा तय नहीं करेगी, तब तक सत्ता की राह आसान नहीं होगी। 2018 में सत्ता में आने के बावजूद सरकार का गिरना आज भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालता है। इसके बाद लगातार चुनावी हार ने संगठन को कमजोर किया है। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान अब ऐसा चेहरा तलाश रहा है जो जनता के बीच स्वीकार्य हो, संगठन को संभाल सके और भाजपा के खिलाफ मजबूत नैरेटिव तैयार कर सके। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस हाईकमान आखिर किस पर दांव खेलता है — अनुभवी और जमीनी पकड़ वाले दिग्विजय सिंह पर, या फिर साफ छवि और हाईकमान की पसंद मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन पर। क्योंकि आने वाला विधानसभा चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक अस्तित्व और भविष्य की दिशा भी तय करेगा। मध्य प्रदेश की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या कांग्रेस नया चेहरा तलाश रही है, या फिर उसे आज भी अपने पुराने अनुभवी नेतृत्व पर सबसे ज्यादा भरोसा है?
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