नीमच। नीमच में भाजपा जिला कार्यालय के भूमि पूजन का ऐतिहासिक आयोजन आज होना है, लेकिन उससे पहले ही एक निमंत्रण कार्ड ने पूरे कार्यक्रम की दिशा बदल दी है। जो दिन संगठन के गौरव का प्रतीक बनना था, वह अब ‘नामों की राजनीति’ का जीवंत उदाहरण बनता नजर आ रहा है।कार्यालय निर्माण को लेकर जिला भाजपा ने भव्य तैयारियां कीं, लेकिन जैसे ही निमंत्रण पत्र सामने आया, उसमें कुछ प्रमुख नामों की गैरमौजूदगी ने सियासी पारा चढ़ा दिया। खासकर पवन पाटीदार और नगर पालिका अध्यक्ष स्वाति चौपड़ा का नाम न होना, अब “साधारण चूक” नहीं बल्कि “सोची-समझी रणनीति” के तौर पर देखा जा रहा है।राजनीति के जानकार इसे ‘श्रेय की सर्जरी’ बता रहे हैं—जहां इतिहास बनने से पहले ही कुछ नामों को ऑपरेशन थियेटर के बाहर रोक दिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि जिस जमीन पर कार्यालय बन रहा है और जिनकी सक्रिय भूमिका रही, वही नाम अगर निमंत्रण पत्र से गायब हैं, तो क्या यह केवल गाइडलाइन है या फिर ‘गाइडेड पॉलिटिक्स’? भले ही दोनों नेताओं ने संगठन के प्रति अपनी निष्ठा जताते हुए बयान को सीमित रखा हो, लेकिन अंदरखाने खदबदाहट साफ महसूस की जा रही है। वहीं कांग्रेस ने इस मौके को लपकते हुए भाजपा की “अंदरूनी खींचतान” को सार्वजनिक मंच पर ला खड़ा किया है।मामला सिर्फ एक कार्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि उस भविष्य की पट्टिका तक जा पहुंचा है, जहां वही नाम उकेरे जाएंगे जो आज आमंत्रण में हैं। यानी आज की ‘सूची’ ही कल का ‘इतिहास’ बनेगी—और शायद इसी इतिहास लेखन में कुछ नामों को फिलहाल ‘विराम’ दे दिया गया है राजनीति में यह कोई नई बात नहीं कि किसे आगे रखना है और किसे किनारे—लेकिन जब संगठन का भवन ही ‘श्रेय की नींव’ पर खड़ा हो, तो सवाल उठना लाजमी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह कार्यालय केवल ईंट-पत्थर का ढांचा बनेगा या फिर आने वाले समय में ‘छूटे हुए नामों’ की कहानी भी इसकी दीवारों से झलकेगी। क्योंकि राजनीति में याद वही रखा जाता है, जो लिखा जाता है—और जो छूट जाता है, वह कभी-कभी सबसे ज्यादा याद रहता है।“कार्यालय का शिलान्यास या श्रेय का चयन? बड़े नाम गायब, सवाल लाजिमी”गायब नामों ने खड़े किए सवाल”