लेखक : अंशुल बैरागी
एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
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भारत ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सौर ऊर्जा को स्वच्छ और भविष्य की ऊर्जा माना जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर सौर परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही हैं। लेकिन जब हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि 25 से 30 वर्षों के लिए निजी कंपनियों को लीज पर दी जाती है, तब यह केवल ऊर्जा उत्पादन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि किसान, पर्यावरण, जल संसाधन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भविष्य की पीढ़ियों का विषय बन जाता है। आज किसानों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वे केवल वार्षिक किराये के आधार पर निर्णय लें या भूमि के भविष्य, अधिकारों और संभावित कानूनी परिणामों को भी समझें?

अधिकांश सोलर लीज समझौतों में भूमि का स्वामित्व किसान के पास रहता है, लेकिन भूमि का उपयोग, निर्माण, बाउंड्री, केबल, ट्रांसफार्मर, मार्ग, पाइपलाइन और संचालन संबंधी अधिकार कंपनी को प्राप्त हो जाते हैं। कई मामलों में किसान अपनी ही भूमि पर स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रह जाता। कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को केवल किराया, रोजगार और विकास के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या उन्हें यह बताया जाता है कि भूमि 30 वर्षों तक कृषि उत्पादन से बाहर हो सकती है? भविष्य में भूमि बेचने या गिरवी रखने में कठिनाई आ सकती है? कंपनी अपने अधिकार किसी अन्य कंपनी या वित्तीय संस्था को हस्तांतरित कर सकती है? कंपनी के दिवालिया होने की स्थिति में क्या होगा? भूमि वापसी की प्रक्रिया क्या होगी? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर अधिकांश किसानों को नहीं दिया जाता।

सौर ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर परियोजना स्वतः पर्यावरण हितैषी हो। यदि परियोजना के लिए फलदार वृक्ष काटे जाएँ, प्राकृतिक जल निकासी मार्ग बदले जाएँ, सिंचाई पाइपलाइनें प्रभावित हों, खेतों के रास्ते बंद हों, चरागाह और जैव विविधता प्रभावित हो, तो स्थानीय स्तर पर गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। कई क्षेत्रों में किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि परियोजना निर्माण के दौरान भूमि समतलीकरण, सड़क निर्माण और बाउंड्रीवाल के कारण प्राकृतिक जल प्रवाह बाधित हो सकता है। यदि आसपास के खेतों में पानी भरता है और फसल नष्ट होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यह प्रश्न अभी भी अनेक परियोजनाओं में अस्पष्ट है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और आजीविका की सुरक्षा की बात करता है। अनुच्छेद 48A और 51A(g) पर्यावरण संरक्षण का दायित्व निर्धारित करते हैं। इसके अतिरिक्त Electricity Act, 2003, Environment Protection Act, 1986, Easements Act, 1882, Companies Act, 2013, Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 तथा मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 जैसे कानून किसानों, पर्यावरण और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधान प्रदान करते हैं। किसी भी लीज एग्रीमेंट से संविधान, पर्यावरण कानून, जल निकासी अधिकार, मार्गाधिकार और तीसरे पक्ष के वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होते।

सौर परियोजनाएँ केवल कंपनी और किसान के बीच का मामला नहीं हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि रास्ते सुरक्षित रहें, जल निकासी बाधित न हो, सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा हो, पर्यावरणीय नियमों का पालन हो तथा किसानों की शिकायतों का समय पर समाधान हो। तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर, पंचायत, कृषि विभाग, वन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
किसी भी एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले किसान अवश्य पूछें कि किराया वृद्धि कितनी होगी? कंपनी दिवालिया हो जाए तो क्या होगा? भूमि किस स्थिति में वापस मिलेगी? जलभराव होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी? पेड़ कटेंगे तो मुआवजा कितना मिलेगा? ट्रांसमिशन लाइन कहाँ से जाएगी? स्थानीय क्षेत्र को CSR से क्या लाभ मिलेगा? क्या कंपनी ने जल निकासी, पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव का अध्ययन कराया है? क्या भविष्य में भूमि के उपयोग पर कोई प्रतिबंध लगेगा?

सौर ऊर्जा का विरोध नहीं किया जा सकता, क्योंकि देश को स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता है। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसान, पर्यावरण और ग्रामीण समाज की चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक परियोजना में पारदर्शिता, कानूनी जागरूकता, पर्यावरणीय संतुलन और किसानों के हितों की समान रूप से रक्षा हो। किसानों को बिना पूरी जानकारी और स्वतंत्र कानूनी सलाह के किसी भी दीर्घकालीन अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए। विकास तभी सार्थक है जब उसमें किसान का सम्मान, प्रकृति का संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो।
“सौर ऊर्जा का स्वागत है, लेकिन किसान और प्रकृति की कीमत पर नहीं।”
Anshul Bairagi
एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
📞 099269 99413
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