नीमच।जिले के नेवड़ स्थित एसआर तिवारी कॉलेज एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। कॉलेज प्रबंधन एवं संचालक-निर्देशक निरंजन (राजू) तिवारी पर बिना स्वीकृति प्राप्त पाठ्यक्रमों का प्रचार-प्रसार कर विद्यार्थियों और अभिभावकों को भ्रमित करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। मामले को लेकर शिक्षा जगत में चर्चा तेज हो गई है।  जानकारी के अनुसार कॉलेज द्वारा एलएलबी एवं बीए-एलएलबी पाठ्यक्रमों के संचालन हेतु शासन स्तर पर किया गया आवेदन निरस्त (रिजेक्ट) किया जा चुका है। इसके बावजूद संस्थान द्वारा इन कोर्सों के बड़े-बड़े विज्ञापन स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाए जा रहे हैं। साथ ही शहर एवं आसपास के क्षेत्रों में होर्डिंग्स और प्रचार बोर्ड लगाकर विद्यार्थियों को प्रवेश के लिए आकर्षित किया जा रहा है। शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार किसी भी शैक्षणिक संस्था को केवल उन्हीं पाठ्यक्रमों का प्रचार करने की अनुमति होती है, जिन्हें संबंधित विश्वविद्यालय, शासन अथवा नियामक संस्था से विधिवत मान्यता एवं संबद्धता प्राप्त हो। ऐसे में बिना स्वीकृति वाले कोर्सों का प्रचार कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सूत्रों के अनुसार इससे पहले भी संस्थान पर बी.फार्मा एवं डी.फार्मा पाठ्यक्रमों के प्रचार को लेकर सवाल उठ चुके हैं। आरोप था कि आवश्यक अनुमति एवं संबद्धता के अभाव के बावजूद इन कोर्सों का प्रचार-प्रसार किया गया था। अब एलएलबी एवं बीए-एलएलबी को लेकर सामने आए नए मामले ने कॉलेज प्रबंधन की कार्यप्रणाली को फिर कटघरे में ला खड़ा किया है। मामले को लेकर यह आशंका भी जताई जा रही है कि संस्थान पहले छात्रों को एलएलबी एवं बीए-एलएलबी जैसे कोर्सों के नाम पर प्रवेश के लिए आकर्षित कर सकता है और बाद में उन्हें किसी अन्य कोर्स में समायोजित या स्थानांतरित करने का प्रयास किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह विद्यार्थियों एवं अभिभावकों के साथ भ्रामक व्यवहार माना जाएगा और छात्रों के शैक्षणिक भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ साबित हो सकता है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विद्यार्थी बिना मान्यता वाले पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले लेते हैं, तो भविष्य में उनकी डिग्री मान्य नहीं मानी जा सकती। इससे नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा एवं दस्तावेज सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। स्थानीय नागरिकों एवं अभिभावकों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद में अभिभावक कॉलेजों पर भरोसा करते हैं, लेकिन यदि किसी संस्थान द्वारा भ्रामक प्रचार कर प्रवेश दिलाया जाता है, तो यह छात्रों के भविष्य और अभिभावकों की मेहनत की कमाई — दोनों के साथ अन्याय है। शहर में जगह-जगह लगे प्रचार बोर्ड और अखबारों में प्रकाशित विज्ञापनों को लेकर अब शिक्षा जगत में सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि संस्थान के दावों और वास्तविक शैक्षणिक स्थिति के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है, जिसकी गंभीर एवं निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।