नीमच। मालवा-मेवाड़ के लाखों किसानों की तकदीर और देश की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ी आगामी अफीम नीति 2026-27 को लेकर जमीनी स्तर पर हाई-प्रोफाइल मंथन शुरू हो गया है। नीमच के एक निजी होटल में आयोजित अफीम सलाहकार समिति की महत्वपूर्ण बैठक में इस बार केवल रस्मी चर्चा नहीं हुई, बल्कि नारकोटिक्स विभाग की कार्यप्रणाली और नीतिगत विसंगतियों पर सीधे और तीखे प्रहार किए गए। बैठक में मौजूद क्षेत्रीय विधायक व पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सकलेचा ने दो टूक लहजे में कहा कि किसान ही इस पूरी व्यवस्था का मुख्य आधार है और उसे परेशान करना पाप है। फैक्ट्रियों या अधिकारियों की मनमानी अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

फैक्ट्रियों के बंद कमरों में भाग्य का फैसला गलत: सकलेचा

वरिष्ठ स्तर पर नीतिगत खामियों को उजागर करते हुए विधायक सकलेचा ने नारकोटिक्स विभाग की पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि अफीम किसान साल भर खून-पसीना बहाकर फसल तैयार करता है, लेकिन उसके भाग्य का फैसला फैक्ट्रियों के बंद कमरों में छोड़ दिया जाता है। किसानों का माल तीन-तीन दिन तक फैक्ट्रियों में पड़ा रहता है, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने विभाग के आला अधिकारियों के सामने मजबूती से मांग रखी कि किसानों के माल का अंतिम निरीक्षण, फाइनल इंस्पेक्शन ऑन-द-स्पॉट यानी तौल के मौके पर ही होना चाहिए और वहीं पर पूरा मामला सेटल किया जाए। फैसले का एकाधिकार केवल फैक्ट्री को सौंप देना पूरी तरह गलत है।

बैठक में पिछले वर्ष की अफीम नीति की एक बड़ी विसंगति की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। पिछली नीति में न्यूनतम 4.2 मार्फिन के औसत वाले किसान को भी 10 आरी का पट्टा मिला और जो किसान कड़ी मेहनत करके 7.6 जैसी उच्च गुणवत्ता वाली मार्फिन लेकर आया, उसे भी 10 आरी के दायरे में ही सीमित कर दिया गया। यह व्यवस्था ईमानदारी से काम करने वाले किसानों का मनोबल तोड़ने वाली है।
इस व्यवस्था को बदलकर पट्टों को तत्काल तीन श्रेणियों में विभाजित करने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत कम मार्फिन वाले पारंपरिक किसानों के लिए 6 आरी, सामान्य औसत वालों के लिए 10 आरी और उच्च मार्फिन देने वाले किसानों के लिए 12 आरी का विशेष पट्टा तय किया जाए। इससे किसानों में गुणवत्ता सुधारने के लिए एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा होगी।